
जबलपुर। रक्षाबंधन के छह दिन बाद आने वाला लोकपर्व हलषष्ठी, जिसे हल छठ भी कहा जाता है, इस वर्ष 14 अगस्त 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा। आचार्य सौरभ उपाध्याय ने बताया कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व संतान की सुख-समृद्धि, कृषि के सम्मान और भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव से जुड़ा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिलाएं यह व्रत बड़ी श्रद्धा और आस्था के साथ करती हैं।

गाय के दूध और हल से जोते अन्न का सेवन वर्जित
इस दिन व्रती महिलाएं निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं। खास बात यह है कि हलषष्ठी के दिन गाय का दूध, दही, मक्खन और उससे बने पदार्थों का सेवन वर्जित है। इसके स्थान पर भैंस का दूध या अन्य विकल्प उपयोग किए जाते हैं। साथ ही, हल से जोते गए अनाज का सेवन भी नहीं किया जाता।
बांस की टोकनी और कृषि का प्रतीक
पर्व पर बांस की टोकनी या डलिया का विशेष महत्व है। इसमें सात प्रकार के अनाज, मौसमी फल, भैंस का दूध-दही, घी, मिट्टी या गोबर से बने बैल-हल के प्रतीक सजाकर रखे जाते हैं। यह टोकनी पूजा के बाद जरूरतमंदों को दान की जाती है। हलषष्ठी का कृषि से गहरा संबंध है, क्योंकि बलराम जी को हलधर कहा जाता है और यह पर्व किसानों और खेती से जुड़ी परंपराओं को सहेजता है।
पूजा और व्रत की विधि
सुबह स्नान के बाद महिलाएं व्रत का संकल्प लेती हैं और दिनभर व्रत रखती हैं। हलषष्ठी माता और बलराम जी की पूजा में फूल, रोली, हल्दी, अक्षत, दीपक और मिठाई अर्पित की जाती है। गाय-बैल को सजाकर, हरा चारा खिलाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद हलषष्ठी व्रत कथा का पाठ कर संतान की रक्षा और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती है।
बलराम जी का जन्मोत्सव
इस दिन बलराम जी का जन्मोत्सव भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है। बलराम जी के हाथ में हल और मूंछदार स्वरूप किसान जीवन के श्रम और धरती से जुड़ाव का प्रतीक है। उनके पूजन से धरती, कृषि और पशु-पक्षियों के प्रति सम्मान की भावना जागृत होती है।
हलषष्ठी पर्व केवल धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि यह मातृत्व, कृषि और पर्यावरण के सम्मान का उत्सव है। इस दिन का पालन हमें हमारी जड़ों, परंपराओं और जीवन मूल्यों से जोड़ता है।