
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश की सामाजिक एकता, नागरिक जिम्मेदारियों और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। नागपुर में 20 अक्टूबर को आयोजित संघ के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी कार्यक्रम में उन्होंने सामाजिक चुनौतियों से निपटने, नई पीढ़ी को सही दिशा देने और विकास के साथ नैतिक मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
समाज की समस्याओं का समाधान संवाद से खोजने की जरूरत
डॉ. भागवत ने कहा कि समाज में समस्याएं उत्पन्न होना और उनके विरोध में आवाज उठना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी भी आंदोलन का लक्ष्य समस्या का समाधान होना चाहिए। विरोध की प्रक्रिया में यदि कटुता बढ़ती है और सामाजिक संबंध प्रभावित होते हैं, तो इससे व्यापक नुकसान हो सकता है। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में संयम, कानून के प्रति सम्मान और जिम्मेदार व्यवहार को आवश्यक बताया।
उन्होंने दूसरे देशों में हुए राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों का संदर्भ देते हुए कहा कि केवल सरकार बदलने से सभी समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं। देश में स्थायी सुधार के लिए सामाजिक सहभागिता और मूल समस्याओं पर काम करना जरूरी है।
विविधताओं के बीच एकता बनाए रखना जरूरी
भारत की सांस्कृतिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि अलग-अलग भाषाओं, परंपराओं और जीवनशैलियों के बावजूद देश की एक साझा राष्ट्रीय पहचान है। इस भावना को मजबूत करना समाज के सभी वर्गों की जिम्मेदारी है।
उन्होंने सामाजिक मतभेदों को बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों से सावधान रहने और आपसी विश्वास को प्राथमिकता देने की बात कही। उनके अनुसार, समाज में एकजुटता और परस्पर सहयोग से ही देश की प्रगति को गति मिल सकती है।
युवाओं को नशे से बचाने की जिम्मेदारी
नई पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने नशीले पदार्थों की बढ़ती समस्या को गंभीर विषय बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं को सही और गलत के बीच अंतर समझाने के लिए परिवार, समाज और प्रशासन को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
युवाओं में विवेकपूर्ण सोच विकसित करने और उन्हें सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने की जरूरत भी उन्होंने रेखांकित की।
तकनीक के साथ नैतिकता का संतुलन आवश्यक
विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के बीच भागवत ने इनके जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने विकास को केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित न रखते हुए पर्यावरण और नैतिक मूल्यों को भी महत्व देने की बात कही।
उनके विचारों में विकास की ऐसी दिशा अपनाने पर बल रहा, जिसमें तकनीकी प्रगति के साथ प्रकृति का संरक्षण और मानवीय संवेदनाएं भी बनी रहें।
भारत की वैश्विक भूमिका पर जोर
भागवत ने भारतीय सामाजिक परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों और मानवता की भावना को देश की महत्वपूर्ण विशेषताओं के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने समाज को संगठित रखने और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
नागपुर में हुए इस आयोजन में सामाजिक सद्भाव, युवाओं के भविष्य, तकनीक के नैतिक उपयोग और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय प्रमुख रहे। संबोधन का व्यापक संदेश यही रहा कि देश की मजबूती के लिए सामाजिक जिम्मेदारी, सकारात्मक सोच और सामूहिक प्रयासों को महत्व देना आवश्यक है।