
जबलपुर। चार खंबा क्षेत्र स्थित मां धूमावती बूढ़ी खेरमाई का मंदिर लगभग 1500 साल से भक्तों की साधना स्थली बना हुआ है। इसे जबलपुर का सबसे प्राचीन खेरमाई मंदिर माना जाता है, इसीलिए इसे बूढ़ी खेरमाई कहा जाता है। नवरात्र में यहां सुबह से लेकर रात तक भक्त पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। विशेष परंपरा के तहत यहां बाना चढ़ाने की परंपरा है, जो भक्तों की आस्था से जुड़ी हुई है।
इतिहास और पौराणिक मान्यता
मान्यता है कि 1500 साल पहले यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था, तभी यहां यह मंदिर स्थापित हुआ। पुराणों के अनुसार दस महासिद्धियों में सातवीं देवी मां काल्हप्रिया हैं। प्रलयकाल में जब सबका विनाश होता है तो केवल धूमावती देवी ही विद्यमान रहती हैं। कथा के अनुसार, एक बार मां पार्वती ने क्षुधा शांत करने के लिए शिवजी को निगल लिया। इससे उनकी भूख तो मिट गई लेकिन शिवजी के विष के प्रभाव से उनके मुख से धुआं निकलने लगा और उनका रूप भयानक हो गया। शिवजी के आशीर्वाद से यही स्वरूप मां धूमावती के रूप में पूजित हुआ। इन्हें विधवाओं की आराध्य देवी भी कहा जाता है।
बाना चढ़ाने की विशेष परंपरा
बूढ़ी खेरमाई मंदिर में मन्नत पूरी होने पर बाना अर्पित करने की परंपरा है। नवरात्र में जवारा विसर्जन के दिन भक्त बाना धारण करते हैं। यहां का सबसे बड़ा बाना 11 लोग एक साथ पहनते हैं। यही नहीं, बूढ़ी खेरमाई मंदिर जबलपुर के विराट जवारा चल समारोह का भी प्रमुख आकर्षण है। शूलों के आसन और अग्नि झूला जैसे चमत्कार भक्तों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। नवरात्र के दौरान प्रतिदिन श्रृंगार दर्शन होते हैं, खासकर पंचमी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को पुष्पों से भव्य श्रृंगार किया जाता है।
नवरात्र पर्व और सांस्कृतिक महत्व
भारतीय संस्कृति में नवरात्र पर्व का विशेष महत्व है। मां धूमावती, जिन्हें बूढ़ी खेरमाई के नाम से जाना जाता है, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की संयुक्त शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। पिछले 1500 वर्षों से यहां स्थापित यह मंदिर आज भी शक्ति और चेतना का संचार कर रहा है। शारदीय नवरात्र में यहां भगवती का विशेष अर्चन और पूजन होता है।
भक्तों की आस्था
मंदिर ट्रस्ट कमेटी के प्रबंधक पंडित रोहित दुबे का कहना है कि यह स्थान आस्था और साधना का अनूठा केंद्र है। वहीं, भक्त अतुल विश्वकर्मा बताते हैं कि वे पिछले 40 वर्षों से मां धूमावती बूढ़ी खेरमाई के दर्शन कर रहे हैं। उनके अनुसार, मां की कृपा से उनके जीवन और परिवार में उन्नति हुई है। वे नवरात्र ही नहीं, बल्कि सालभर मंदिर में पूजन कर मानसिक शांति पाते हैं।