
पुराणों और उपनिषदों में पूजा का साकार और विविध रूप सामने आया। वहीं से शुरू हुई छठ माता की पूजा। प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण इन्हें षष्ठी देवी कहते हैं। ये बालक-बालिकाओं की अधिष्ठात्री बालदा तथा विष्णुमाया कही जाती हैं। देवी भागवत पुराण में षष्ठी देवी के महात्म्य के साथ उनकी एक कथा मिलती है।
षष्ठी देवी और सूर्य की उपासना
सूर्य की शक्ति का एक नाम सविता भी है। इसी से यह जोड़कर देखा जाता है कि सविता ही छठ माई हैं। एक विचार यह भी है कि सनातनी अपना हर अनुष्ठान अग्नि को साक्षी मानकर करते हैं। माता सीता ने भी पूर्वजों के पिंडदान के समय सूर्य को साक्षी बनाया था। सूर्य पंच देवों में से एक प्रकट देव हैं। इसीलिए व्रती छठ माता की पूजा-अर्चना कर समय सूर्य को ही अपना साक्ष्य बनाते हैं या सूर्य की छठी रश्मि की प्रार्थना करते हैं।
कार्तिक मास में छठ पूजा का महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे ने बताया कि कार्तिक के महीने को सारे महीनों में श्रेष्ठ माना जाता है। इस महीने में नदी में स्नान और दीप दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। कार्तिक महीने में सूर्य दक्षिणायन होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस समय सूर्य से ‘निरोग-किरण’ निकलती है। इसका लाभ व्रती को बेहतर स्वास्थ्य के रूप में मिलता है। यह व्रत महिलाएं और पुरुष दोनों करते हैं पर अधिकांशत महिलाएं यह व्रत करती हैं।
सूर्यदेव और षष्ठी माता की आराधना
यह त्योहार सूर्यदेव और षष्ठी माता जिन्हें छठी माता भी कहा जाता है को समर्पित माना गया है। छठी मैया को संतानों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। खासकर उत्तर भारत और बिहार में छठ पूजा का उत्साह अधिक देखने को मिलता है। नहाय खाय से छठ पूजा पर्व की शुरुआत मानी जाती है।
छठ पूजा 2025 का शुभारंभ
25 अक्टूबर शनिवार को नहाय-खाय के साथ ही लोक आस्था का महापर्व छठ की शुरुआत होगी। इस दिन व्रती नर्मदा, गंगा समेत पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान के बाद सूर्य देव की पूजा करते हैं। इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। भोजन में चावल-दाल और लौकी की सब्जी ग्रहण की जाती है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि को नहाय खाय होता है। यह पर्व संतान की प्राप्ति और उनकी समृद्धि के लिए रखा जाता है। इस पर्व में भगवान भास्कर और छठी मइया की पूजा का विधान है।
छठ पूजा की तिथियां और विशेष संयोग
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से लेकर सप्तमी तिथि तक छठ पूजा मनाई जाती है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है, जबकि सप्तमी तिथि को प्रातःकाल में उगते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। छठ पूजा पर दुर्लभ सुवृद्धि योग समेत कई अद्भुत संयोग बन रहे हैं। इस योग में व्रत करने से कई गुना लाभ प्राप्त होता है। इसकी शुरुआत नहाय खाय से होती है और अगले दिन खरना मनाया जाता है।
छठ पूजा के शुभ योग
छठ पूजा के दिन सुकर्मा और राजयोग का निर्माण हो रहा है। व्रती आयुष्मान एवं सुकर्म योग में सूर्य देव को जल का अर्घ्य देंगे। इस योग में सूर्य देव की उपासना करने से सुख और समृद्धि में अपार वृद्धि होगी।
छठ पूजा की मुख्य तिथियां
- नहाय खाय का दिन: 25 अक्टूबर 2025, शनिवार।
- खरना की तारीख: 26 अक्टूबर 2025, रविवार।
इस दिन छठ व्रती पूरी निष्ठा से छठी मइया को खीर का प्रसाद बनाकर भोग लगाती हैं। लोहंडा का यह प्रसाद घर-परिवार और पास-पड़ोस में जनमानस को ग्रहण कराने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि खरना का प्रसाद ग्रहण करने से जीवन के सारे दूख दूर होते हैं। छठी मइया व्रती की सारी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।
छठ पूजा का संध्या अर्घ्य और उदीयमान सूर्य अर्घ्य
27 अक्टूबर, सोमवार को अस्ताचलगामी भगवान भाष्कर को संध्याकालीन अर्घ्य अर्पण किया जाएगा। इस दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर छठ व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतति वृद्धि की कामना आदित्य देव से करते हैं। 28 अक्टूबर, मंगलवार को उदीयमान सूर्य को प्रात:कालीन अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन दीनानाथ के उगते स्वरूप का दर्शन कर छठ व्रती खुशहाली की कामना करती हैं। परिवार के लोग भी छठ व्रती को सामने से दूध-जल का अर्घ्य अपर्ण कर अपनी निष्ठा प्रकट करते हैं।
छठ व्रत के नियम
छठ पर्व पूजा के दौरान व्रत रहे साधक को सूर्य देव को अर्घ्य देने से पहले किसी चीज का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही व्रत करने वाले साधक को इस दौरान जमीन पर सोना चाहिए। इसके साथ ही छठ पूजा से करीब 10 दिन पहले से ही अरवा चावल और सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करना चाहिए।