Diwali 2026: इस शुभ मुहूर्त में करें लक्ष्मी-गणेश पूजन, जानिए मंत्र, विधि और दीपदान का महत्व

8 नवंबर को मनेगी दीपावली, लक्ष्मी-गणेश पूजन में साधना, श्रद्धा और समृद्धि का होगा संगम

जबलपुर। दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और घरों को सजाने का पर्व नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में यह अंधकार से प्रकाश, अभाव से समृद्धि, निराशा से आशा और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का महापर्व है। कार्तिक अमावस्या की रात्रि में जब मिट्टी के दीपकों की पंक्तियां घर-आंगन को आलोकित करती हैं, तब उनके साथ भारतीय समाज की आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना भी प्रकाशित होती है। दीपावली का प्रत्येक दीप इस विश्वास का प्रतीक है कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, ज्ञान, परिश्रम, सदाचार और ईश्वर के प्रति श्रद्धा से नई राह निकाली जा सकती है।

वर्ष 2026 में दीपावली रविवार, 8 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन मां महालक्ष्मी, भगवान गणेश और मां सरस्वती के पूजन का विशेष महत्व रहेगा। व्यापारिक प्रतिष्ठानों में बही-खातों का पूजन, घरों में दीपदान, मंदिरों में विशेष आराधना और परिवारों में सामूहिक पूजा के साथ दीपोत्सव का उल्लास दिखाई देगा। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या की प्रदोष बेला में विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश पूजन करने से परिवार में सुख, शांति, सद्बुद्धि और समृद्धि की कामना की जाती है।

दीपावली का संदेश केवल धन प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। भारतीय चिंतन में लक्ष्मी का संबंध वैभव के साथ-साथ सौंदर्य, स्वच्छता, सदाचार, परिश्रम, अन्न, ऐश्वर्य और लोककल्याण से भी है। वहीं भगवान गणेश विवेक, बुद्धि और विघ्नों को दूर करने के प्रतीक हैं। इसीलिए दीपावली पर लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी का पूजन किया जाता है। मां सरस्वती की आराधना ज्ञान और विवेक की उस भूमिका को रेखांकित करती है, जिसके बिना धन का उचित उपयोग संभव नहीं है।

दीपावली का मुहूर्त: प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन का महत्व

दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल को विशेष महत्व दिया जाता है। सूर्यास्त के बाद आरंभ होने वाली इस बेला में दीप प्रज्वलित कर मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और मां सरस्वती का पूजन किया जाता है। अनेक पंचांगों में स्थिर वृषभ लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजन को विशेष शुभ माना गया है। मान्यता है कि स्थिर लग्न में किया गया पूजन घर में सुख-समृद्धि और स्थायित्व की कामना का प्रतीक है।

वर्ष 2026 में दीपावली 8 नवंबर, रविवार को है। उपलब्ध पंचांग गणनाओं के अनुसार मध्य प्रदेश के अलग-अलग नगरों में लक्ष्मी पूजन के समय में कुछ मिनटों का अंतर रहेगा। भोपाल के लिए प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन का समय शाम 6:02 बजे से रात 8:01 बजे तक बताया गया है। जबलपुर में पूजन का अंतिम समय निर्धारित करने के लिए स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त, लग्न और अमावस्या की स्थिति के अनुसार प्रकाशित पंचांग से पुष्टि की जानी चाहिए।

अमावस्या तिथि 8 नवंबर को पूर्वाह्न लगभग 11:27 बजे आरंभ होकर 9 नवंबर को दोपहर लगभग 12:31 बजे तक रहने की गणना दी गई है। इस प्रकार दीपावली की मुख्य पूजा 8 नवंबर की संध्या को की जाएगी। गृहस्थ परिवारों के लिए प्रदोष काल में लक्ष्मी-गणेश पूजन को प्रमुखता दी जाती है। मध्यरात्रि के विशेष मुहूर्त का विधान भी कुछ परंपराओं में मिलता है, लेकिन सामान्य गृहस्थ पूजा के लिए स्थानीय पंचांग में दिया गया प्रदोषकालीन मुहूर्त अधिक उपयोगी रहेगा।

धार्मिक कर्मकांड में मुहूर्त का महत्व है, लेकिन पूजा की मूल भावना श्रद्धा, शुद्धता और सदाचार है। इसलिए मुहूर्त के साथ पूजा की तैयारी, परिवार की सहभागिता और मन की एकाग्रता को भी समान महत्व देना चाहिए।

क्यों होती है दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा?

मां लक्ष्मी को सनातन परंपरा में धन, धान्य, ऐश्वर्य, सौभाग्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। समुद्र मंथन की पौराणिक कथा में मां लक्ष्मी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है। देवताओं और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किए जाने पर अनेक दिव्य रत्नों के साथ देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। उन्होंने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इस प्रसंग में लक्ष्मी का प्राकट्य केवल संपदा की प्राप्ति नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन, सौंदर्य और मंगल का प्रतीक भी माना जाता है।

दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन की परंपरा के पीछे यह भाव है कि घर और जीवन में समृद्धि का स्वागत किया जाए। घर की सफाई, दीपों से सजावट, सुंदर रंगोली, स्वच्छ वस्त्र और सुगंधित वातावरण इस स्वागत के प्रतीक हैं। परंपरागत मान्यता है कि मां लक्ष्मी स्वच्छ, व्यवस्थित और मंगलमय स्थान में निवास करती हैं। इसका व्यावहारिक संदेश भी स्पष्ट है—जहां स्वच्छता, अनुशासन, परिश्रम, विनम्रता और सद्भाव होगा, वहां उन्नति के अवसर अधिक विकसित हो सकेंगे।

लक्ष्मी पूजन के दिन घर के मुख्य द्वार को साफ किया जाता है, रंगोली बनाई जाती है, दीप जलाए जाते हैं और शुभ चिह्न अंकित किए जाते हैं। कई परिवार मुख्य द्वार पर कमल, स्वस्तिक, शुभ-लाभ और चरणचिह्न बनाते हैं। इनका उद्देश्य मंगल का स्वागत और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का संकल्प है।

लक्ष्मी की आराधना में धन को साधन माना गया है, साध्य नहीं। धन का अर्जन ईमानदारी से हो, उसका उपयोग परिवार के पालन-पोषण, शिक्षा, सेवा, दान और समाज के हित में हो—यही समृद्धि का व्यापक अर्थ है।

लक्ष्मीजी के प्रमुख मंत्र और उनका भावार्थ

दीपावली पर मां लक्ष्मी के मंत्रों का जप श्रद्धापूर्वक किया जाता है। मंत्र जप के समय स्वच्छ आसन पर बैठकर मन को शांत रखना चाहिए। संख्या से अधिक महत्वपूर्ण शुद्ध उच्चारण, एकाग्रता और भक्ति है।

1. मां लक्ष्मी का सरल मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।

यह मां महालक्ष्मी को प्रणाम करने का प्रचलित मंत्र है। भक्त इसे पूजा के समय श्रद्धापूर्वक जप सकते हैं।

2. महालक्ष्मी का प्रार्थना मंत्र

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

इस प्रार्थना में महामाया और देवताओं द्वारा पूजित महालक्ष्मी को प्रणाम किया गया है। भक्त देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए सुख, शांति और कल्याण की कामना करते हैं।

3. श्रीसूक्त का महत्व

वैदिक परंपरा में श्रीसूक्त को मां लक्ष्मी की उपासना का महत्वपूर्ण स्तोत्र माना जाता है। दीपावली पर अनेक घरों और मंदिरों में श्रीसूक्त का पाठ किया जाता है। इसके मंत्रों में लक्ष्मी के स्वर्णिम, मंगलमय, पुष्टिदायक और समृद्धि प्रदान करने वाले स्वरूप का वर्णन है।

4. भगवान गणेश का मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः।

यह भगवान गणेश का प्रचलित मंत्र है। दीपावली की पूजा में सबसे पहले गणेशजी का स्मरण कर विघ्नों के निवारण, विवेक और शुभ कार्यों की सिद्धि की प्रार्थना की जाती है।

5. मां सरस्वती का मंत्र

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।

इस मंत्र से मां सरस्वती का स्मरण किया जाता है। दीपावली में ज्ञान, वाणी, विवेक और सही निर्णय की कामना के साथ सरस्वती पूजन का भी महत्व है।

मंत्रों का जप कोई व्यापारिक लेन-देन नहीं है कि निश्चित संख्या में जप करने से निश्चित धनराशि प्राप्त हो जाए। इनका मूल उद्देश्य मन को एकाग्र करना, श्रद्धा को मजबूत करना और व्यक्ति को शुभ कर्मों की प्रेरणा देना है। धन-समृद्धि के लिए ईमानदार परिश्रम, उचित योजना, बचत, सेवा और अनुशासन भी उतने ही आवश्यक हैं।

घर पर कैसे करें लक्ष्मी-गणेश पूजन?

दीपावली की पूजा को परिवार के सभी सदस्य मिलकर सरलता से कर सकते हैं। पूजा की तैयारी दिन में ही कर लेना उपयोगी है, ताकि संध्या के समय हड़बड़ी न हो।

पूजन सामग्री: मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं या चित्र, स्वच्छ लाल अथवा पीला वस्त्र, चौकी, कलश, जल, अक्षत, रोली, हल्दी, चंदन, पुष्प, माला, दूर्वा, पान, सुपारी, मौली, धूप, दीप, घी या तिल का तेल, रुई की बत्ती, फल, मिठाई, खील-बताशे, नैवेद्य, दक्षिणा और आरती की थाली रखें। उपलब्धता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार सामग्री में परिवर्तन हो सकता है।

पहला चरण—घर और पूजा स्थल की तैयारी: पूजा से पहले घर और पूजा स्थल को स्वच्छ करें। चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं। प्रतिमाओं को इस प्रकार स्थापित करें कि परिवार के सभी सदस्य सुविधापूर्वक दर्शन कर सकें। दीपक और पूजन सामग्री सुरक्षित स्थान पर रखें।

दूसरा चरण—संकल्प और गणेश स्मरण: शांत मन से बैठकर परिवार के कल्याण, सद्बुद्धि, आरोग्य, सदाचार और लोकमंगल का संकल्प लें। भगवान गणेश का ध्यान करें और ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र से उनका पूजन करें। परंपरा के अनुसार उन्हें दूर्वा, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।

तीसरा चरण—कलश स्थापना: कलश में स्वच्छ जल भरें। उसमें परंपरा के अनुसार आम के पत्ते या उपलब्ध पवित्र पत्ते लगाएं और ऊपर नारियल स्थापित करें। कलश को मंगल और पूर्णता का प्रतीक मानते हुए उसका पूजन करें।

चौथा चरण—मां लक्ष्मी का पूजन: मां लक्ष्मी को पुष्प, अक्षत, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ मंत्र का जप करें। श्रीसूक्त या लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ भी किया जा सकता है। देवी के समक्ष प्रार्थना करें कि परिवार में परिश्रम, ईमानदारी, अन्न, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि और सद्भाव बना रहे।

पांचवां चरण—गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त आराधना: दीपावली में लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी का पूजन विशेष रूप से प्रचलित है। मां सरस्वती का स्मरण भी करें, ताकि समृद्धि के साथ ज्ञान और सही निर्णय लेने की क्षमता बनी रहे। व्यापार करने वाले परिवार अपनी बही-खातों, लेखा पुस्तकों, कंप्यूटर या कार्य संबंधी साधनों का पूजन अपनी परंपरा के अनुसार कर सकते हैं।

छठा चरण—नैवेद्य और आरती: फल, मिठाई और अन्य नैवेद्य अर्पित करें। परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती करें। आरती के बाद प्रसाद वितरित करें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

सातवां चरण—दीपदान: घर के मुख्य द्वार, पूजा स्थल और सुरक्षित स्थानों पर दीप जलाएं। आंगन, बालकनी या खिड़की पर दीप रखते समय ध्यान रखें कि आग से पर्दे, कागज, बिजली के तार और ज्वलनशील वस्तुएं दूर रहें। बच्चों को जलते दीपकों और पटाखों के पास अकेला न छोड़ें।

पूजा की विधि परिवार की परंपरा, क्षेत्रीय रीति और उपलब्ध समय के अनुसार सरल या विस्तृत हो सकती है। विस्तृत वैदिक कर्मकांड कराने वाले परिवार योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में पूजा कर सकते हैं।

भगवान गणेश का पूजन पहले क्यों?

सनातन परंपरा में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में उनका स्मरण किया जाता है। गणेशजी का स्वरूप गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। उनका बड़ा मस्तक विवेक और व्यापक दृष्टि, बड़े कान ध्यानपूर्वक सुनने, छोटी आंखें एकाग्रता और सूंड परिस्थिति के अनुसार कार्य करने की क्षमता का प्रतीक मानी जाती है।

दीपावली पर गणेशजी का पूजन इस भाव को प्रकट करता है कि धन प्राप्त करने से पहले व्यक्ति में सही निर्णय लेने की बुद्धि होनी चाहिए। केवल धन होना पर्याप्त नहीं; उसे अर्जित करने, सुरक्षित रखने और समाजोपयोगी बनाने के लिए विवेक भी आवश्यक है।

दीपावली की पौराणिक कथा: श्रीराम के अयोध्या आगमन का उत्सव

दीपावली के साथ जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यताओं में भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने का प्रसंग प्रमुख है। रामायण परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने चौदह वर्ष का वनवास पूरा किया और रावण का वध कर माता सीता तथा लक्ष्मणजी के साथ अयोध्या लौटे। उनके आगमन पर अयोध्यावासियों ने प्रसन्नता से नगर को सजाया और दीप जलाकर स्वागत किया। यह कथा दीपावली को धर्म की विजय और प्रियजनों के पुनर्मिलन के उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

इस प्रसंग का संदेश केवल विजय का उत्सव नहीं है। श्रीराम का जीवन मर्यादा, सत्य, वचनपालन, कर्तव्य और लोकहित के आदर्शों से जुड़ा है। दीपावली पर घरों में दीप जलाना उस मर्यादा और धर्मनिष्ठा को अपने जीवन में उतारने का प्रतीक भी माना जा सकता है।

समुद्र मंथन और मां लक्ष्मी का प्राकट्य

दीपावली के लक्ष्मी पूजन को समझने के लिए समुद्र मंथन की कथा का स्मरण भी महत्वपूर्ण है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। इस मंथन से अनेक दिव्य वस्तुएं और रत्न प्रकट हुए। इन्हीं में मां लक्ष्मी का प्राकट्य भी बताया गया है। देवी लक्ष्मी को समृद्धि, सौंदर्य, ऐश्वर्य और शुभता की अधिष्ठात्री माना जाता है।

समुद्र मंथन का प्रसंग जीवन के लिए भी एक संदेश रखता है। मंथन में परिश्रम, सहयोग, धैर्य और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसी प्रकार जीवन में स्थायी समृद्धि भी परिश्रम, धैर्य, सही निर्णय और नैतिकता से प्राप्त होती है।

गोवर्धन पूजा: प्रकृति और गौसंवर्धन का संदेश

दीपावली के अगले दिन अनेक क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा की जाती है। वर्ष 2026 में गोवर्धन पूजा 9 नवंबर को मनाई जा सकती है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला से जुड़ा है। भागवत परंपरा के अनुसार, ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा दी।

गोवर्धन पूजा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति पर निर्भर है। पर्वत, जल, वन, मिट्टी, पशु और कृषि जीवन के आधार हैं। जल संरक्षण, वृक्षारोपण, मिट्टी की रक्षा, पशुओं के प्रति संवेदना और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाना गोवर्धन पूजा की भावना के अनुरूप है।

भाई दूज: भाई-बहन के स्नेह का उत्सव

दीपोत्सव का अंतिम प्रमुख पर्व भाई दूज है। वर्ष 2026 में भाई दूज 10 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन बहनें अपने भाइयों के कल्याण और दीर्घायु की कामना करती हैं तथा भाई अपनी बहनों के प्रति स्नेह और सुरक्षा का भाव व्यक्त करते हैं।

भाई दूज से जुड़ी पौराणिक मान्यता यमराज और उनकी बहन यमुना से संबंधित है। कहा जाता है कि यमुना ने अपने भाई यमराज का आदर-सत्कार किया और उनके कल्याण की कामना की। इस प्रसंग के कारण यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, आत्मीयता और पारिवारिक संबंधों का प्रतीक बन गया।

व्यापारिक प्रतिष्ठानों में बही-खाता पूजन

दीपावली व्यापारिक समुदाय के लिए भी विशेष महत्व रखती है। अनेक व्यापारी इस दिन बही-खातों, लेखा पुस्तकों, तिजोरी और व्यापार में उपयोग होने वाले उपकरणों का पूजन करते हैं। कुछ समुदायों में इसे चोपड़ा पूजन कहा जाता है। नए वित्तीय लेखे की शुरुआत करते हुए व्यापारी मां लक्ष्मी और भगवान गणेश से व्यवसाय में उन्नति, ग्राहकों के विश्वास और उचित निर्णयों की कामना करते हैं।

परंपरागत बही-खाते अब डिजिटल लेखांकन, कंप्यूटर और अन्य तकनीकी साधनों में बदल रहे हैं, लेकिन पूजा का भाव वही है—काम में पारदर्शिता, हिसाब-किताब में ईमानदारी और व्यापार में न्यायपूर्ण व्यवहार।

दीपदान का महत्व: एक दीप से अनेक दीप

भारतीय परंपरा में दीपदान को पुण्य और मंगल से जोड़ा गया है। दीपावली पर घर के मुख्य द्वार, मंदिर, आंगन और अन्य सुरक्षित स्थानों पर दीप जलाए जाते हैं। मंदिरों में दीपमालाएं सजती हैं और कई स्थानों पर सामूहिक दीपदान का आयोजन होता है। मिट्टी के दीपक स्थानीय कारीगरों की आजीविका को सहारा देते हैं। इसीलिए स्थानीय कुम्हारों से दीप खरीदना और पारंपरिक शिल्प को प्रोत्साहित करना भी दीपावली की सामाजिक भावना से जुड़ सकता है।

दीपदान का सबसे सुंदर रूप वह है, जब व्यक्ति किसी दूसरे के जीवन में भी प्रकाश पहुंचाए। जरूरतमंद परिवार को भोजन देना, बच्चों की शिक्षा में सहायता करना, वृद्धजनों से मिलना और सेवा संस्थानों में सहयोग करना पर्व को अधिक अर्थपूर्ण बना सकता है।

दीपावली और पर्यावरण: परंपरा के साथ जिम्मेदारी

दीपावली आनंद और उत्साह का पर्व है, लेकिन उत्सव मनाते समय पर्यावरण और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। अत्यधिक ध्वनि और धुएं से बच्चों, बुजुर्गों, सांस संबंधी समस्याओं वाले लोगों तथा पशु-पक्षियों को परेशानी हो सकती है। इसलिए पटाखों के उपयोग में संयम रखना और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए।

मिट्टी के दीपक, पुनः उपयोग किए जा सकने वाले सजावटी सामान और प्राकृतिक रंगों से बनी रंगोली पर्यावरण के अनुकूल विकल्प हो सकते हैं। जलते दीपकों को पर्दों, कागज और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें।

दीपावली का वास्तविक अर्थ: धन के साथ धर्म और विवेक

दीपावली की पूजा में मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और मां सरस्वती का संयुक्त स्मरण एक संपूर्ण जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है। लक्ष्मी समृद्धि का, गणेश विवेक का और सरस्वती ज्ञान का प्रतीक हैं। इन तीनों का संतुलन ही जीवन को स्थिरता प्रदान करता है।

केवल धन हो, लेकिन विवेक न हो, तो संपत्ति का दुरुपयोग हो सकता है। ज्ञान हो, लेकिन परिश्रम और संसाधनों का उचित उपयोग न हो, तो प्रतिभा का पूर्ण विकास नहीं हो पाता। इसी प्रकार समृद्धि और ज्ञान दोनों हों, लेकिन नैतिकता न हो, तो व्यक्ति समाज के लिए आदर्श नहीं बन सकता। इसलिए दीपावली का संदेश धन, ज्ञान, सदाचार और सेवा को एक साथ अपनाने में निहित है।

दीपावली पर लें पांच संकल्प

इस दीपोत्सव पर प्रत्येक परिवार पांच संकल्प लेकर पर्व को अधिक सार्थक बना सकता है।

  • धन का अर्जन ईमानदारी से करेंगे और उसका उपयोग परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा लोककल्याण में करेंगे।
  • घर और आसपास स्वच्छता बनाए रखेंगे तथा जल, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय कम करेंगे।
  • परिवार के बुजुर्गों, बच्चों और जरूरतमंदों के प्रति समय, संवेदना और सम्मान का भाव रखेंगे।
  • क्रोध, ईर्ष्या, कटुता और अहंकार को कम करने का प्रयास करेंगे तथा विवादों को संवाद से सुलझाएंगे।
  • अपने उत्सव में पर्यावरण, पशु-पक्षियों और समाज के कमजोर वर्गों के हित का ध्यान रखेंगे।

संस्कारधानी में दीपोत्सव का संदेश

संस्कारधानी जबलपुर की सांस्कृतिक पहचान धर्म, आध्यात्मिकता, साहित्य और सामाजिक सहभागिता से जुड़ी है। दीपावली इस पहचान को और सुदृढ़ करने का अवसर है। मंदिरों की सजावट, घरों में पूजा, बाजारों की रौनक, दीपों की पंक्तियां और परिवारों का मिलन शहर के वातावरण में उल्लास भरते हैं।

इस अवसर पर परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। धार्मिक विधियों का सम्मान हो, स्थानीय कारीगरों और छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहन मिले, पर्यावरण की रक्षा हो और उत्सव सभी वर्गों के लिए आनंद का अवसर बने—ऐसी दीपावली संस्कारधानी की सांस्कृतिक भावना को साकार कर सकती है।

एक दीप अपने भीतर भी जलाएं

दीपावली 2026 का पर्व हमें स्मरण कराता है कि प्रकाश का महत्व तभी है, जब वह अंधकार को दूर करे। मां लक्ष्मी की पूजा हमें समृद्धि के साथ सदाचार अपनाने, भगवान गणेश की आराधना विवेक विकसित करने और मां सरस्वती का स्मरण ज्ञान को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है।

8 नवंबर की दीपावली पर घरों में दीप जलें, मंदिरों में आरती हो, परिवार एक साथ बैठकर पूजा करे और समाज में सद्भाव बढ़े—यही इस पर्व की सुंदर कामना है। दीपावली का प्रकाश केवल दीवारों और आंगनों तक सीमित न रहे, बल्कि विचारों, व्यवहार और संबंधों में भी दिखाई दे।

जब कमाई में ईमानदारी, व्यवहार में विनम्रता, संबंधों में प्रेम और मन में सेवा का भाव होगा, तभी लक्ष्मी पूजन का संदेश जीवन में सार्थक होगा। आइए, इस दीपावली एक दीप अपने घर में जलाएं, एक दीप अपने मन में और एक दीप किसी ऐसे जीवन में, जिसे हमारे सहयोग की आवश्यकता है।

दीपावली 2026: लक्ष्मी पूजन के शुभ मुहूर्त

ज्योतिषाचार्य: पंडित सौरभ दुबे

लग्न अनुसार मुहूर्त

  • मेष लग्न: दोपहर 4:29 से शाम 6:03 बजे तक।
  • वृषभ लग्न: शाम 6:03 से रात 8:13 बजे तक।
  • सिंह लग्न: रात 12:41 से मध्यरात्रि 2:53 बजे तक।
  • गोधूलि बेला: शाम 5:21 से रात 7:53 बजे तक।

चौघड़िया मुहूर्त

  • अमृत: सुबह 10:34 से दोपहर 12:10 बजे तक।
  • शुभ: दोपहर 1:36 से 3:18 बजे तक।
  • शुभ: शाम 6:02 से रात 7:38 बजे तक।
  • अमृत: रात 7:39 से 9:57 बजे तक।
  • चर: रात 9:58 से 11:04 बजे तक।
  • लाभ: रात 1:32 से 2:53 बजे तक।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दीपावली 2026 से संबंधित धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, पूजा विधि, मंत्रों और शुभ मुहूर्त की जानकारी विभिन्न धार्मिक परंपराओं एवं पंचांग गणनाओं के आधार पर दी गई है। पूजा के मुहूर्त में स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतर संभव है। श्रद्धालुओं से अनुरोध है कि लक्ष्मी-गणेश पूजन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों से पहले अपने क्षेत्र के ज्योतिषाचार्य या पंडित से मुहूर्त की पुष्टि अवश्य कर लें। लेख में वर्णित धार्मिक उपाय एवं मान्यताएं आस्था पर आधारित हैं।

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