
जबलपुर। दीपावली के बाद गुलौआ चौक में बुधवार को आयोजित पारंपरिक चंडी मढ़ई मेला आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम बना। हजारों लोगों ने इस ऐतिहासिक आयोजन में हिस्सा लेकर सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत किया। माता चंडी की पूजा-अर्चना के साथ प्रारंभ हुए इस मेले में धार्मिक उत्साह, लोक संस्कृति और सामाजिक मेलजोल की झलक एक साथ देखने को मिली।
गोंडवाना काल से चली आ रही परंपरा
वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वर द्विवेदी ने बताया कि गुलौआ चौक का यह मढ़ई मेला गोंडवाना काल से आयोजित होता आ रहा है। कहा जाता है कि रानी दुर्गावती के शासनकाल में भी इस मेले का आयोजन विशेष रूप से किया जाता था। उस समय यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि रणनीति निर्माण का केंद्र भी हुआ करता था। राज्य की गुप्त योजनाएं और नीतियां इन्हीं मेलों में तय होती थीं, जहां सैनिक, व्यापारी और गुप्तचर वेश बदलकर शामिल होते थे।

चंडी माता की पूजा के साथ शुरू हुआ मेला
मेले की शुरुआत पारंपरिक चंडी माता पूजा से हुई। श्रद्धालुओं ने माता की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर आशीर्वाद लिया। शाम होते ही गुलौआ चौक से लेकर संकट मोचन हनुमान मंदिर तक का पूरा क्षेत्र रोशनी और भक्तिमय संगीत से गूंज उठा। चंडी माता की परिक्रमा देर रात तक जारी रही।
लोक संस्कृति और मनोरंजन का संगम
मेला में पारंपरिक कला और लोक संस्कृति की झलक दिखाई दी। विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकारों ने अहीर नृत्य और दिवारी गायन की शानदार प्रस्तुतियां दीं। बच्चों ने झूलों का आनंद लिया तो बड़ों ने देसी व्यंजनों और लोकगीतों का रसपान किया। मिट्टी की कलाकृतियां, हस्तनिर्मित सामान, बर्तन, कपड़े और सौंदर्य प्रसाधनों की दुकानों पर खासी भीड़ रही।
स्थानीय व्यापार और रोजगार का केंद्र
गुलौआ चौक का मढ़ई मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। छोटे दुकानदारों, फेरीवालों और हस्तशिल्प कारीगरों के लिए यह मेला कमाई का बड़ा अवसर बनता है। ग्रामीण इलाकों से आए लोगों ने देसी सामानों की खरीदारी की। गुड़ की मिठाइयां, चाट, समोसे और अन्य व्यंजन जमकर बिके।

इतिहास और आस्था का अद्भुत मेल
वरिष्ठ पत्रकार देवशंकर अवस्थी ने बताया कि 11वीं-12वीं शताब्दी में मढ़ई मेलों की शुरुआत हुई थी। यह परंपरा गोंडवाना काल से आज तक जारी है। पहले इन मेलों में मुगलों और अंग्रेजों के खिलाफ रणनीतियां बनाई जाती थीं और लोकगीतों के माध्यम से लोगों को आजादी के लिए प्रेरित किया जाता था। वर्तमान में जबलपुर जिले में आधा सैकड़ा से अधिक मढ़ई मेलों का आयोजन होता है, जिनमें गुलौआ चौक का मेला सबसे प्रमुख माना जाता है।
रात तक रही भीड़, परंपरा का निर्वहन
बुधवार की रात गुलौआ चौक पर भारी भीड़ उमड़ी। देर रात तक माता चंडी की आरती और परिक्रमा का सिलसिला चलता रहा। महिलाओं ने पारंपरिक वस्त्रों में सजकर पूजा की, तो बच्चों ने खेल और झूलों का आनंद लिया। मेले में आई भीड़ ने साबित कर दिया कि सदियों पुरानी परंपरा आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।