

उन्होंने कहा कि भगवान शिव के जीवन में धतूरे, भांग और आक जैसी दुर्गंध युक्त वस्तुओं को भी स्थान मिला है। कालकूट विष को उन्होंने अपनाया, सर्प जैसे जहरीले जीव को गले में स्थान दिया, और भूत-प्रेतों को भी अपने गणों में स्वीकार किया। इससे हमें यह सीख मिलती है कि भगवान शिव सभी का सम्मान करते हैं। समाज में यदि सम्मान प्राप्त करना है तो पहले दूसरों को सम्मान देना सीखना होगा।
महात्मा जी ने आगे कहा कि प्राणी मात्र से प्रेम और उनके हित की भावना ही शिव बनने का मार्ग है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, यदि उसे सच्चे हृदय से अपनाया जाए तो समाज में एकता और सद्भाव बना रहता है।
इस अवसर पर नर्मदेश्वर महादेव का रूद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन, अर्चन और आरती संपन्न की गई। कार्यक्रम में
सीए अखिलेश जैन, डॉ. हितेश अग्रवाल, अशोक मनोध्या, लोकराम कोरी, प्रहलाद बिल्थरे, विध्येश भापकर, एस.बी. मिश्रा, रामजी पुजारी, आचार्य रामफल शास्त्री, कामता गौतम, लालमणि मिश्रा, ब्रह्मचारी हिमांशु, प्रियांशु सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
नरसिंह मंदिर में प्रतिदिन परम पूज्य महाराज जी के सानिध्य में प्रातः 10 बजे से महारुद्राभिषेक पूजन का आयोजन किया जा रहा है। भक्तों से इस पुण्य अवसर में अधिकाधिक संख्या में शामिल होने का आग्रह किया गया है।