
जबलपुर। मराठी साहित्य अकादमी एवं दत्त भजन मंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मकर संक्रमण व्याख्यानमाला के अंतर्गत आज नागपुर की सुश्री मनीषा साधू द्वारा “बहिणाबाईंच्या कविता” विषय पर भावपूर्ण उद्बोधन प्रस्तुत किया गया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि धरती और आकाश को क्षितिज पर मिलाने वाली बहिणाबाई चौधरी की कविताएं सामान्य जीवन के गहरे अनुभवों को असाधारण संवेदना के साथ व्यक्त करती हैं।
निरक्षर होकर भी अनुभव विश्वव्यापी
सुश्री मनीषा साधू ने कहा कि बहिणाबाई चौधरी स्वयं निरक्षर थीं, लेकिन उनका अनुभव संसार अत्यंत व्यापक था। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से तत्कालीन स्त्री जीवन की पीड़ा, संघर्ष और भावनाओं को अत्यंत सजीव रूप में अभिव्यक्त किया। बहिणाबाई की कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के कठोर यथार्थ का दस्तावेज है।
गृहस्थी के कष्टों का यथार्थ चित्रण
उन्होंने बहिणाबाई की प्रसिद्ध पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा — “अरे संसार संसार, जसा तवा चुल्यावर, आधी हातला चटके, तेव्हा मिळते भाकर।” इस कविता में कवयित्री ने गृहस्थी के कष्टों, त्याग और श्रम को अत्यंत सहज लेकिन प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है, जो ग्रामीण स्त्री के जीवन को सजीव कर देता है।
मन की चंचलता का काव्यात्मक रूप
इसी प्रकार “मन वढाळ वढाळ, वाऱ्यासंगं डोलणारं, आभाळ फाटलं तरी, पाऊस-पाणी येणारं।” कविता का उल्लेख करते हुए वक्ता ने कहा कि इसमें मन की चंचलता, आशा और जीवन के प्रति विश्वास का सुंदर चित्रण मिलता है। बहिणाबाई ने हथचक्की (जातं) पर अनाज पीसते हुए ग्रामीण जीवन के समग्र आयामों को अपने दोहों में समाहित कर दिया है।
माल्यार्पण से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
व्याख्यानमाला का शुभारंभ श्री शशांक दातार द्वारा माल्यार्पण कर किया गया। इसके पश्चात अतिथि वक्ता सुश्री मनीषा साधू का स्वागत किशोर कळमकर, विश्वास पाटणकर तथा श्रीमती भाग्यश्री पाटणकर द्वारा श्रीफल एवं शाल भेंट कर किया गया।
गणमान्य नागरिकों की रही उपस्थिति
कार्यक्रम का मंच संचालन एवं आभार प्रदर्शन श्रीमती मनीषा भावे ने किया। इस अवसर पर मराठी साहित्य अकादमी के निदेशक संतोष गोडबोले, रेखा गोडसे पाटील, सुनंदा चारवेकर, श्रीमती जया पागे, अविनाश हळबे, श्रीमती आभा दातार, श्रीमती आभा गोरे सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।