
जबलपुर। मराठी साहित्य अकादमी एवं दत्त भजन मंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मकर संक्रमण व्याख्यानमाला के अंतर्गत १०८ स्वामी ब्रह्मचैतन्य महाराज, बुलढाणा द्वारा “शिवलिंगायत परंपरा” विषय पर सारगर्भित उद्बोधन दिया गया। अपने संबोधन में उन्होंने शिव, आगम परंपरा और वीर शैव लिंगायत दर्शन के गूढ़ तत्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
शिव के निश्वास से आगम परंपरा का उद्भव
स्वामी ब्रह्मचैतन्य महाराज ने कहा कि शिव के निश्वास से आगम परंपरा का उद्भव हुआ, जो आगे चलकर वीर शैव लिंगायत परंपरा का आधार बनी। उन्होंने बताया कि प्रत्येक मनुष्य के हृदय में अंगुष्ठ प्रमाण प्राणज्योत विद्यमान है, वही शिव का साकार स्वरूप है, जिसे शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।
शिव परम गुरु और जगत के मूलाधार
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति गुरु-प्रधान संस्कृति है और शिव परम गुरु हैं। शिव ही संपूर्ण जगत का मूलाधार हैं। “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उपासना का तत्व एक ही है, किंतु विद्वान उसे भिन्न-भिन्न रूपों में व्याख्यायित करते हैं।
शिवलिंग आराधना से पारलौकिक साधना फलित
वीर शैव लिंगायत परंपरा के अंतर्गत पारलौकिक साधना शिवलिंग की आराधना से फलित होती है। इस परंपरा में जीव-शिव साधना के साथ-साथ सामाजिक समानता, जातिगत भेदभाव का विरोध और कर्मकांडों के सरलीकरण पर विशेष बल दिया गया है, जो समाज को समरसता की दिशा में आगे बढ़ाता है।
लोकमान्य तिलक की प्रतिमा पर माल्यार्पण से शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ श्री रविंद्र परांजपे द्वारा लोकमान्य तिलक जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया। इसके पश्चात अतिथि वक्ता स्वामी ब्रह्मचैतन्य महाराज का स्वागत मराठी साहित्य अकादमी के निदेशक संतोष गोडबोले, सौ. प्रज्ञा चौधरी, अजय नाहटकर एवं विजय भावे द्वारा श्रीफल एवं शाल भेंट कर किया गया।
गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति
कार्यक्रम का मंच संचालन एवं आभार प्रदर्शन संजय आपटे ने किया। इस अवसर पर अनिल दांडेकर, शरद आठले, अभय गोरे, श्रीमती शुभदा परांजपे, पद्माकर तलवारे, सदानंद गोडबोले सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।