तीखी बात: अंतरात्‍मा की आवाज में विवशता का दर्द!

राजीव उपाध्‍याय

अंतरात्‍मा से निकली आवाज सशक्‍त होती है, किसी भी प्रकार से विवशता का दर्द नहीं झलकता। बिहार के सीएम नीतीश कुमार के राज्‍यसभा में जाने की मंशा में उनकी अंतरात्‍मा की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती बल्कि चेहरे पर एक विवशता दिखाई दी। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई सिटिंग सीएम अपना पद छोड़कर राज्‍यसभा में जाए। एक्‍स पर लिखे उनके शब्‍द भी उनके नहीं लग रहे हैं। यह भी सत्‍य है कि मुख्‍यमंत्री की कुर्सी उनको हमेशा प्रिय रही है तभी इसके लिए उनको पाला बदलना भी पड़ा तो उन्‍होंने देर नहीं की। वे हमेशा परिवारवाद का विरोध करते रहे लेकिन अब उम्र के इस पड़ाव में अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाना कहीं न कहीं सवाल खड़े कर रहा है।

आंकड़े कुछ कहते हैं

वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत, बिना नीतीश कुमार के कल्‍पना नहीं की सकती है। वर्ष 2025 के चुनाव में एनडीए 202 सीट जीती थी। पिछले चुनाव की तुलना में 77 सीट बढ़ीं। एनडीए का वोट शेयर 46.57% रहा वहीं 2020 में वोट शेयर 34.79% था। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 89 सीट मिलीं। बीजेपी की 15 सीटें बढ़ीं। बीजेपी का वोट शेयर 20.08% रहा। जबकि वर्ष 2020 में बीजेपी का वोट शेयर 19.36% था। वर्ष 2025 के चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा।

वहीं वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में जदयू को 85 सीट मिलीं। इस चुनाव में जदयू की 42 सीटें बढ़ीं। जदयू का वोट शेयर 19.25% रहा जबकि वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में 15.34% रहा था। ये आंकड़ें जाहिर करते हैं कि नीतीश कुमार जदयू के लिए कितना जरूरी हैं। उनके दम पर ही एनडीए बिहार में सत्‍ता बचा सकी। हालांकि इस चुनाव में बीजेपी की सीटें बढ़ी हैं और वोट शेयर भी बढ़ा है। यह आंकड़ें कह रहे हैं कि बीजेपी को बिहार में अपनी पैठ मजबूत बनाए रखने के लिए अपना सीएम बनाना समय की जरूरत है।

विवशता के कदम

निशांत कुमार 50 वर्ष के हो रहे हैं। राजनीति ने कभी उनको आकर्षित नहीं किया। वे साफ्टवेयर इंजीनियर हैं। वे राजनीति के दांव-पेंच नहीं जानते हैं। इसके बाद भी वे कदम राजनीति में रख रहे हैं, जिसमें कहीं न कहीं उनकी भी विवशता दिखाई देती है।

नीतीश कुमार से जदयू का अस्तित्‍व

जदयू का दूसरा नाम ही नीतीश कुमार है। राज्‍यसभा में जाने के बाद भी जदयू पर उनकी कमान रहेगी लेकिन बिहार में सीएम कोई और होगा। समर्थकों को लग रहा है कि बिहार जदयू के हाथ से निकल जाएगा। बिहार की जनता और नीतीश कुमार के समर्थकों को खुश करने के लिए निशांत कुमार को बड़ी जिम्‍मेदारी दी जा सकती है लेकिन जिसे राजनीति में रुचि न हो वह उम्र इस पड़ाव में राजनीति को समझेंगे तब तक कहीं देर न हो जाए।

सीने में छिपा दर्द

इस पूरे घटनाक्रम में नीतीश कुमार के दिल में कहीं न कहीं दर्द छिपा है। वे आसानी से तो सत्‍ता को नहीं छोड़ सकते। वहीं निशांत कुमार अब राजनीति सीखेंगे और खुद को इस क्षेत्र में जब मजबूत करेंगे तभी जदयू को टूटने से रोक सकेंगे। नीतीश कुमार जानते हैं कि उनके दिल्‍ली चले जाने से बिहार में उनके समर्थकों में रोष है इस दर्द का अहसास खुद नीतीश कुमार को है। उनको आस अपने बेटे निशांत कुमार से है कि वे जदयू को एकजुट रख सकें क्‍योंकि उनके समर्थक निशांत कुमार में नीतीश कुमार की छवि देखते हैं।

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