
पन्ना। बुंदेलखंड की धार्मिक नगरी पन्ना में कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर आस्था और भक्ति का सागर उमड़ पड़ा है। यहां चार शताब्दियों से चली आ रही परम पवित्र परंपरा “पृथ्वी परिक्रमा” श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हो रही है। श्री प्राणनाथ जी मंदिर परिसर सहित आसपास के क्षेत्रों में देशभर से आए हजारों सुंदरसाथ एकत्र हुए हैं जो इस परिक्रमा के माध्यम से आत्मा को परमधाम से जोड़ने का भाव रखते हैं। भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।
पन्ना का श्री प्राणनाथ जी मंदिर- प्रणामी संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ
पन्ना स्थित श्री प्राणनाथ जी मंदिर प्रणामी संप्रदाय का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, जहाँ लगभग चार सौ वर्षों से यह परंपरा निरंतर चल रही है। शरद पूर्णिमा के एक माह बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन यह परिक्रमा आयोजित की जाती है। इस अवसर पर देश के विभिन्न प्रांतों – महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि से श्रद्धालु पन्ना पहुंचते हैं। कुछ भक्त नेपाल और अन्य देशों से भी आते हैं।
20 किलोमीटर लंबी परिक्रमा- आत्मिक साधना का प्रतीक
पृथ्वी परिक्रमा लगभग 20 किलोमीटर लंबी होती है, जिसमें श्रद्धालु किलकिला नदी किनारे और पहाड़ी मार्गों से गुजरते हुए नदियों, वृक्षों और मंदिरों को प्रणाम करते हैं। यह यात्रा भक्तों के लिए केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मिक साधना है। परिक्रमा के दौरान पूरा नगर भक्ति रस में डूब जाता है। मार्ग में सत्संग, भजन, संकीर्तन और ध्वज यात्रा के दृश्य भक्तिभाव को और प्रगाढ़ कर देते हैं।
अक्षरातीत पारब्रह्म परमात्मा की भूमि
धार्मिक मान्यता है कि यह वही पावन भूमि है जहाँ महामति श्री प्राणनाथ जी ने सुंदरसाथ को परमधाम की रासलीला का दिव्य अनुभव कराया था। यह स्थान अक्षरातीत पारब्रह्म परमात्मा की दिव्य अनुभूति से ओतप्रोत है। इसलिए भक्त इस परिक्रमा को आत्मा की शुद्धि और ईश्वर से एकात्मता के रूप में देखते हैं।
मानवता, एकता और सेवा का संदेश
श्री 108 प्राणनाथ जी मंदिर ट्रस्ट के पूर्व सचिव राकेश कुमार शर्मा ने बताया कि 20 किलोमीटर लंबे मार्ग में प्रसाद, जल और विश्राम की व्यवस्था की गई है। संतों और मंदिर प्रबंधन समिति का कहना है कि यह परिक्रमा केवल धर्म का उत्सव नहीं बल्कि मानवता, एकता और सेवा का प्रतीक है। यह आयोजन ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को साकार करता है, जहाँ सभी एक ही ईश्वर की संतान बनकर प्रेम और सद्भाव का संदेश देते हैं। परिक्रमा का समापन विशेष आरती और महाप्रसाद के साथ होगा, जिसमें हजारों श्रद्धालु अपने जीवन को धन्य मानते हैं।