
जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में कुलसचिव की जिम्मेदारी एक बार फिर बदल गई है। सोमवार को डॉ. रविशंकर सोनवाल के कार्यमुक्त होने के बाद कुलसचिव का प्रभार प्रो. एसएस संधू को सौंपा गया। प्रो. संधू अप्रैल 2027 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय के इस महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर एक बार फिर अल्प अवधि के लिए जिम्मेदारी तय होने की स्थिति बनी है।
पांच जिलों के 163 कॉलेजों का जिम्मा
पांच जिलों के 163 कॉलेजों से जुड़े इस विश्वविद्यालय में पिछले करीब दो वर्षों से कुलसचिव पद को लेकर स्थायित्व नहीं बन पाया है। अलग-अलग समय में परीक्षा नियंत्रक, क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक और प्राध्यापकों को कुलसचिव का दायित्व दिया जाता रहा है। बार-बार नेतृत्व बदलने से विश्वविद्यालय की प्रशासनिक कार्यप्रणाली के साथ अकादमिक गतिविधियों की निरंतरता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। खासतौर पर परीक्षा और परिणाम से संबंधित शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद शिक्षक को प्रभार
विश्वविद्यालय में उपकुलसचिव के अलावा तीन असिस्टेंट रजिस्ट्रार, फाइनेंस कंट्रोलर और परीक्षा नियंत्रक जैसे प्रशासनिक पदों पर अधिकारी मौजूद हैं। इसके बावजूद कुलसचिव की जिम्मेदारी प्राध्यापक को दिए जाने से व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विश्वविद्यालय में नियमित शिक्षकों की संख्या पहले ही काफी कम है। ऐसे में प्राध्यापक को प्रशासनिक काम में लगाने से शिक्षण और शोध गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है।
कई नाम, लेकिन स्थायी व्यवस्था नहीं
कुलसचिव की जिम्मेदारी पिछले ढाई साल के दौरान कई अधिकारियों के पास रही। इनमें पूर्व परीक्षा नियंत्रक प्रो. रश्मि टंडन, पूर्व क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक डॉ. संतोष जाटव, डॉ. रत्नेश कुरलिया, आरएस बघेल और प्रो. सुरेंद्र सिंह शामिल हैं। आरएस बघेल की नियुक्ति शासन स्तर पर कुलसचिव के तौर पर हुई थी। उन्होंने करीब 11 माह तक पद संभाला और इसके बाद सेवानिवृत्त हो गए। वहीं डॉ. रत्नेश कुरलिया को अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
156 पद स्वीकृत, नियमित शिक्षक केवल 16
रादुविवि में करीब छह हजार सीटें और 29 से अधिक विभाग हैं। इसके मुकाबले विश्वविद्यालय में नियमित प्राध्यापकों की संख्या महज 16 रह गई है। शिक्षकों के 156 पद स्वीकृत हैं, लेकिन बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। कई विभागों में नियमित शिक्षकों के अभाव में शैक्षणिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से रिक्त शैक्षणिक पदों को भरने के लिए प्रक्रिया चलाए जाने की बात कही जाती रही है। ऐसे में एक ओर शिक्षकों की कमी और दूसरी ओर प्राध्यापकों को प्रशासनिक जिम्मेदारियां दिए जाने से विश्वविद्यालय की अकादमिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शिक्षक संकट के बीच प्रशासनिक जिम्मेदारी भी चुनौती
रादुविवि में शिक्षकों की कमी का मुद्दा पहले भी सामने आता रहा है। सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट में 156 स्वीकृत शिक्षक पदों में 26 नियमित शिक्षक कार्यरत और 130 पद रिक्त बताए गए थे। इसी रिपोर्ट में बायोसाइंस विभाग के अध्यक्ष प्रो. एसएस संधू के अप्रैल 2027 में सेवानिवृत्त होने की जानकारी भी दी गई थी।
ऐसे में अब यदि प्रो. संधू को कुलसचिव का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है, तो उनके पास प्रशासनिक जिम्मेदारी के साथ शैक्षणिक दायित्व भी रहेंगे। इससे विश्वविद्यालय में पहले से मौजूद शिक्षक कमी और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था में लगातार होने वाले बदलावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर स्थायी और पूर्णकालिक व्यवस्था कब तक बन पाएगी। प्रशासनिक स्थिरता का सीधा संबंध परीक्षा, परिणाम, विद्यार्थियों की समस्याओं और अकादमिक गतिविधियों की समयबद्धता से भी जुड़ा है।
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