
जबलपुर। प्रेम की वास्तविक परिभाषा हमें भगवान शिव से सीखनी चाहिए। संसार में लोग प्रेम करते हैं, पर प्रायः उस वस्तु से जो उनके उपयोग की हो। किंतु बिना उपयोग अथवा बिना कारण किसी से प्रेम करना – यह केवल भगवान शिव ही कर सकते हैं। इसलिए उन्हें ‘भूतभावन’ भी कहा जाता है।

भूतभावन का अर्थ – समाज से तिरस्कृतों से प्रेम
भूत-प्रेतों से प्रेम करना अर्थात उन लोगों से प्रेम करना जिन्हें समाज ने तिरस्कृत किया हो या जिनकी समाज में उपेक्षा होती हो। भगवान शिव का अपनत्व उन सभी के लिए है जो समाज की दृष्टि में अनुपयोगी बन चुके हों।
शिवत्व की अवधारणा – अपनत्व का विस्तार
स्वामी नरसिंह देवाचार्य जी महाराज ने कहा कि भूतभावन भगवान शिव से हमें यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि समाज का चाहे कोई भी वर्ग या व्यक्ति क्यों न हो, यदि आप उन्हें बहुत कुछ न भी दे सकें तो कम से कम थोड़ा सा अपनत्व अवश्य दीजिए। प्राणीमात्र के प्रति प्रेम, सम्मान और अपनत्व की भावना ही शिवत्व की सच्ची अवधारणा है।
श्रावण मास में पूजन अर्चन एवं रुद्राभिषेक
यह संदेश पूज्य श्रीमद् जगतगुरु नृसिंह पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी नरसिंहदेवाचार्य जी महाराज ने श्रावण मास के पावन अवसर पर नरसिंह मंदिर (शास्त्री ब्रिज) में नर्मदेश्वर महादेव के रूद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन और आरती के दौरान व्यक्त किया।
भक्तों की रही उपस्थिति
इस अवसर पर लालमन मिश्र, कामता शास्त्री, रामफल शास्त्री, ब्रह्मचारी हिमांशु, प्रियांशु, पवन सहित अनेक भक्त उपस्थित रहे।
प्रत्येक दिन महारुद्राभिषेक
श्रावण मास के दौरान नरसिंह मंदिर में प्रतिदिन प्रातः 10 बजे से पूज्य महाराज जी के सानिध्य में महारुद्राभिषेक पूजन का आयोजन किया जा रहा है।