
मनीष श्रीवास्तव
“पेड़ मत काटो… जंगल बचाओ… पहाड़ मत तोड़ो… नदियों को मत मारो…”
एक समय था जब सरकारें और समाज मिलकर प्रकृति संरक्षण की बातें करते थे। गांवों में बड़े-बुजुर्ग पेड़ काटने को पाप मानते थे। तालाबों की सफाई सामूहिक जिम्मेदारी होती थी। पहाड़ों को देवता और नदियों को मां का दर्जा दिया जाता था। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। विकास की अंधी दौड़ में जंगल सिकुड़ रहे हैं, पहाड़ टूट रहे हैं, नदियां दम तोड़ रही हैं और हवा जहरीली होती जा रही है। विश्व पर्यावरण दिवस पर सवाल यही है कि आखिर बीते 200 वर्षों में प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता कितना बदल गया?
पहले प्रकृति के साथ संतुलित था जीवन
यदि 150 से 200 साल पहले की बात करें तो भारत का बड़ा हिस्सा घने जंगलों से ढका हुआ था। गांवों के आसपास बड़े-बड़े वन क्षेत्र होते थे। नदियों का जल इतना स्वच्छ था कि लोग सीधे नदी और कुओं का पानी पी लेते थे। तालाब सिर्फ जल स्रोत नहीं बल्कि सामाजिक जीवन का केंद्र हुआ करते थे। जंगलों का उपयोग जरूरत के अनुसार किया जाता था, लालच के अनुसार नहीं। लकड़ी काटने से पहले पेड़ लगाने की परंपरा थी। पहाड़ों को काटकर सड़कें और कॉलोनियां बसाने की सोच नहीं थी।
अंग्रेजी शासन में शुरू हुआ दोहन
करीब 100 से 150 वर्ष पहले अंग्रेजी शासन के दौरान स्थिति बदलनी शुरू हुई। रेलवे लाइनें बिछाने और उद्योगों के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए। जंगलों को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा। कई पहाड़ी क्षेत्रों में खनन शुरू हुआ। नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होने लगा। फिर भी उस समय आबादी कम होने के कारण प्रकृति पर दबाव आज जितना भयावह नहीं था।
आजादी के बाद विकास, लेकिन संतुलन की कमी
लगभग 50 से 100 साल पहले आजादी के बाद देश में विकास का नया दौर शुरू हुआ। बांध बने, फैक्ट्रियां लगीं, शहरों का विस्तार हुआ। सड़कें और कॉलोनियां तेजी से बढ़ीं। इसी दौर में जंगलों का प्रतिशत तेजी से घटने लगा। गांवों के तालाब धीरे-धीरे खत्म होने लगे। कई शहरों में तालाबों को पाटकर इमारतें खड़ी कर दी गईं। पहाड़ों में विस्फोट कर सड़कें और खदानें बनाई जाने लगीं। उस समय विकास जरूरी था, लेकिन पर्यावरण संतुलन पर उतना ध्यान नहीं दिया गया।
पिछले दशकों में बढ़ा पर्यावरण संकट
पिछले 30 से 50 वर्षों में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक हुई है। आबादी बढ़ी, शहरीकरण तेज हुआ और उपभोग की संस्कृति ने प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाला। आज बड़े शहरों में स्वच्छ हवा मिलना मुश्किल हो गया है। नदियों में सीवर और फैक्ट्रियों का गंदा पानी छोड़ा जा रहा है। भूजल लगातार नीचे जा रहा है। पहाड़ों को काटकर रिसॉर्ट और कॉलोनियां बनाई जा रही हैं। जंगलों में मशीनें दौड़ रही हैं और वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास खत्म हो रहा है।
घटते जंगल और बदलता मौसम
विशेषज्ञों के अनुसार पहले भारत में वन क्षेत्र का दायरा कहीं अधिक विस्तृत था, जबकि आज कानूनी आंकड़ों में वन क्षेत्र मौजूद होने के बावजूद वास्तविक घने जंगल लगातार कम हो रहे हैं। गांवों में जहां कभी नीम, पीपल, बरगद और आम के बड़े पेड़ आम दिखाई देते थे, वहां अब कंक्रीट और मोबाइल टावर खड़े हैं। यही कारण है कि गर्मी लगातार बढ़ रही है। मौसम का संतुलन बिगड़ चुका है। कभी सूखा, कभी बाढ़ और कभी असमय बारिश अब सामान्य बात बन चुकी है।
जल संकट बनता जा रहा बड़ा खतरा
जल संकट भी तेजी से बढ़ रहा है। पहले गांवों में तालाब और कुएं वर्षभर पानी देते थे। आज अधिकांश जल स्रोत या तो सूख चुके हैं या प्रदूषित हो चुके हैं। बोतलबंद पानी का कारोबार बढ़ना इस बात का संकेत है कि स्वच्छ पानी अब प्राकृतिक अधिकार नहीं बल्कि बाजार की वस्तु बनता जा रहा है।
वायु और ध्वनि प्रदूषण का बढ़ता असर
वायु प्रदूषण की स्थिति भी बेहद गंभीर है। पहले गांवों और छोटे शहरों में लोग खुली और स्वच्छ हवा में जीवन जीते थे। आज वाहन, फैक्ट्रियां, धूल और धुआं हवा को जहरीला बना रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों में सांस संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसके साथ ही ध्वनि प्रदूषण भी नया खतरा बन चुका है। तेज डीजे, ट्रैफिक और मशीनों का शोर मानसिक स्वास्थ्य तक को प्रभावित कर रहा है।
अब सोच बदलने की जरूरत
प्रकृति से मिलने वाले तत्व — स्वच्छ हवा, शुद्ध पानी, हरियाली और शांत वातावरण — धीरे-धीरे विलासिता बनते जा रहे हैं। विकास जरूरी है, लेकिन यदि विकास प्रकृति को नष्ट करके होगा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट और गहरा होगा।
आज विश्व पर्यावरण दिवस पर सिर्फ पौधे लगाने की औपचारिकता नहीं, बल्कि सोच बदलने की जरूरत है। जरूरत इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए। क्योंकि यदि जंगल खत्म होंगे, नदियां मरेंगी और पहाड़ टूटेंगे, तो अंततः संकट इंसान के अस्तित्व पर ही आएगा।
शायद आने वाले समय में बच्चों को किताबों में दिखाना पड़े — “बेटा, इसे जंगल कहते थे…”