Diwali 2025: दीपावली के दूसरे दिन पन्ना धाम में सजी दिवारी नृत्य की तीन सौ साल पुरानी परंपरा

पन्‍ना। “समूचे बुंदेलखंड क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों से ग्वालों की सैकड़ों टोलियां मंदिरों की पवित्र नगरी में दिवारी नृत्य करने आती हैं। ग्वाले भगवान श्री कृष्ण को अपना बालसखा मानते हैं और यहां उनके सानिध्य में पूरे भक्ति भाव के साथ नृत्य करते हैं।”

श्रद्धा और आस्था के केंद्र पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर और श्री जुगल किशोर जी मंदिर में दीपावली के दूसरे दिन परीवा को दिवारी नृत्य की धूम रहती है। समूचे बुंदेलखंड से ग्वाले विशेष वेशभूषा व हाथों में मोर पंख लिए यहां पहुंचते हैं और मंदिरो में माथा टेककर दिवारी नृत्य करते हैं। पन्ना में दिवारी नृत्य की यह अनूठी परंपरा लगभग 300 वर्षों से चली आ रही है, जो आज भी उसी तरह जारी है। पन्ना शहर के अन्य प्रमुख मंदिरों श्री राम जानकी, श्री बलदाऊ जी मंदिर, श्री जगन्नाथ स्वामी मंदिर व शक्तिपीठ बड़ी देवन मंदिर में जाकर वहां भी तरह-तरह के करतब दिखाते हुए ग्वाले दिवारी नृत्य करते हैं। यह अद्भुत नजारा देखने लोगों की भीड़ उमड़ती है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में आज भी जीवंत है दीवारी नृत्य की परंपरा

बताते हैं कि दिवारी नृत्य की यह अनूठी प्राचीन परंपरा यहाँ तीन सौ वर्षों से चली आ रही है। दीपावली के दूसरे दिन परीवा को यहाँ उत्तरप्रदेश के बाँदा जिले से बड़ी संख्या में ग्वालों की टोलियां आती हैं जबकि मध्यप्रदेश के छतरपुर, दमोह, टीकमगढ़ आदि जिलों के ग्रामीण इलाकों से ग्वाले यहाँ आते हैं और मंदिरो में नृत्य कर अपने को धन्य समझते हैं। पन्ना सहित पड़ोसी जिलों के ग्रामीण अंचलों से सैकड़ों की संख्या में ग्वालों की टोलियां यहाँ रात्रि 12 बजे से ही पहुंचने लगती हैं। प्रथमा को सुबह 5 बजे से भगवान जुगल किशोर जी के दरबार में माथा टेकने के साथ ही दिवारी नृत्य का सिलसिला शुरू हो जाता है जो पूरे दिन चलता है।

हाथों में मोर पंख और रंग-बिरंगी पोशाक ने मोहा मन

सुबह से ही हाथों में मोर पंख लिए तथा रंग बिरंगी पोशाक पहने ग्वालों की टोलियों का जुगल किशोर जी, प्राणनाथ जी, बलदाऊ जी, श्रीराम जानकी आदि मंदिरों में आने का सिलसिला शुरू हो गया था। ग्वाले पूरे भक्ति भाव के साथ भगवान की नयनाभिराम छवि के दर्शन करने के उपरांत पूरी मस्ती के साथ नगड़िया, ढोलक और मजीरों की धुन में दिवारी नृत्य व रोमांचकारी लाठी बाजी का प्रदर्शन करते हैं, जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग यहां खिंचे चले आते हैं।

भगवान श्री कृष्ण को बताते हैं अपना सखा

परीवा को पन्ना के श्री जुगल किशोर जी ने भी ग्वाले का वेष धारण किया। इस वेष के दर्शन सिर्फ इसी दिन होते हैं। दिवारी नृत्य का प्रदर्शन करने वाले पूरे अधिकार के साथ भगवान श्री कृष्ण को अपना बाल सखा मानते हैं। इसी आत्मीय भाव को लेकर ग्वाले तपोभूमि पन्ना में आकर मंदिरों में माथा टेकते हैं तो उनमें असीम ऊर्जा का संचार हो जाता है। इसी भाव दशा में ग्वाले सुध बुध खोकर जब दिवारी नृत्य करते हैं तो उन्हें इस बात की अनुभूति होती है मानो बालसखा कृष्ण स्वयं उनके साथ दिवारी नृत्य कर रहे हैं।

बुन्देलखण्ड अंचल में प्रसिद्ध है ग्वाल बाल का दिवारी नृत्य

समूचे बुन्देलखण्ड अंचल में कार्तिक कृष्ण अमावस्या से प्रथमा को ग्वाल बाल दिवारी नृत्य करते हैं और विभिन्न प्रकार के करतब भी दिखाते हैं, जो दीपावली के अवसर पर गांव-गांव में होता है। दिवारी नृत्य की टोलियों में शामिल ग्वालों को मौनी कहा जाता है।

विभिन्न प्रांतो से आए श्रद्धालु भी हुए शामिल

मौनियों की टोली जब पूरी मस्ती में दिवारी नृत्य करती है तो दर्शकों के पांव भी थिरकने लगते हैं। यह दृश्य पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर में देखने को मिला जब मौनियों की टोली पूरे जोश के साथ नृत्य कर रही थी तो वहां उपस्थित देश के विभिन्न प्रांतो से आए श्रद्धालु सुंदरसाथ भी उनके साथ नृत्य करते हुए नजर आए। दीपावली के दूसरे दिन पन्ना शहर में दिवारी नृत्य की धूम देखते ही बनती है। समूचा शहर नगडिय़ों, ढोलक व मजीरों की विशेष धुन से गुंजायमान रहता है।

दिवारी नृत्य करने वाली ग्वालों की टोलियों में शामिल मौनी अपने विशेष वेशभूषा में नृत्य करते हैं। वे सिर पर मोर पंख व कमर में घुंघरूओं का पट्टा बांधते हैं, मोर पंख का पूरा एक गठ्ठा मौनी अपने हांथ में भी थामे रहते हैं तथा इसी गठ्ठर को उछालकर नृत्य करते हैं।

रिपोर्ट: राकेश कुमार शर्मा

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