
आषाढ़ शुक्ल की एकादशी से भगवान विष्णु चिर निद्रा में चले जाते हैं और चार महीने तक विश्राम करते हैं। इस दौरान भगवान भोलेनाथ सृष्टि का कार्यभार संभालते हैं, इसी कारण चार महीनों तक शिव पूजन का विशेष महत्व रहता है। इन चार महीनों के विश्राम के बाद जब भगवान विष्णु जागते हैं, तो उसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है।
देवउठनी एकादशी की तिथि और महत्व
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी एकादशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन देवता गहरी निद्रा से जागते हैं और इसके साथ ही विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। इस वर्ष संशय की स्थिति थी कि देवउठनी एकादशी 1 नवंबर को मनाई जाए या 2 नवंबर को।
ज्योतिषाचार्य पं. सौरभ दुबे के अनुसार, एकादशी तिथि का प्रवेश 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि 3:34 बजे से होकर 1 नवंबर की मध्यरात्रि 2:27 बजे तक रहेगा। चूंकि सूर्योदय से एकादशी तिथि प्राप्त हो रही है, इसलिए देवउठनी एकादशी 1 नवंबर 2025 को ही मनाई जाएगी।
तुलसी-शालिग्राम विवाह 2 नवंबर को
देवउठनी एकादशी के अगले दिन द्वादशी तिथि को भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह कराया जाता है। पं. सौरभ दुबे के अनुसार, इस वर्ष 2 नवंबर को दोपहर 1:39 से उत्तराभाद्रपद नक्षत्र प्रारंभ होगा, जो विवाह के लिए शुभ माना गया है। इसलिए तुलसी विवाह 2 नवंबर को किया जाएगा। वहीं 1 नवंबर को देवउठनी ग्यारस का व्रत रखा जाएगा।
देवउठनी एकादशी से जुड़ी कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, शंखचूड़ नामक दैत्य की पत्नी वृंदा अत्यंत सती थी। उसके सतीत्व को भंग किए बिना शंखचूड़ का वध असंभव था। इसलिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व भंग किया, जिसके बाद भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध किया। क्रोधित होकर वृंदा ने श्रीहरि को शिला बनने का श्राप दिया। तभी से भगवान विष्णु शालिग्राम रूप में पूजित हैं। वृंदा ने अगले जन्म में तुलसी का रूप लिया, और भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि बिना तुलसी दल के उनकी पूजा कभी पूर्ण नहीं मानी जाएगी।
शालिग्राम का धार्मिक महत्व
शालिग्राम एक काले गोलाकार पत्थर के रूप में होता है, जो नेपाल की गंडकी नदी से प्राप्त होता है। इस पत्थर में प्राकृतिक रूप से शंख, चक्र, गदा या पद्म के चिन्ह बने होते हैं। शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है और कार्तिक माह में इसकी पूजा विशेष फलदायी होती है।
देवउठनी एकादशी पर विशेष आयोजन
देवउठनी एकादशी के दिन घरों और मंदिरों को सजाया जाता है, दीपों की पंक्तियां जलाकर देवताओं को जगाया जाता है। शाम के समय भक्तजन भजन-कीर्तन करते हुए “उठो देव उठो” के गीत गाते हैं। इस दिन से विवाह, गृहप्रवेश और अन्य सभी शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।