
जबलपुर। हर साल मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर काल भैरव जयंती मनाई जाती है। इसे कालाष्टमी, भैरव अष्टमी या महाकाल भैरव जयंती के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव के रौद्र रूप ‘काल भैरव’ की आराधना का दिन माना जाता है। मान्यता है कि भगवान भैरव की पूजा करने से मृत्यु का भय समाप्त होता है और जीवन में आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं।
कब है काल भैरव जयंती 2025?
ज्योतिषाचार्य पं. सौरभ दुबे के अनुसार, इस वर्ष काल भैरव जयंती बुधवार, 12 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 नवंबर, मंगलवार को रात 4 बजकर 42 मिनट पर होगी और इसका समापन 12 नवंबर, बुधवार को रात 3 बजकर 47 मिनट पर होगा। अतः काल भैरव जयंती का पर्व 12 नवंबर को मनाना शुभ रहेगा।
काल भैरव जयंती पर बन रहे हैं विशेष योग
ज्योतिषाचार्य पं. सौरभ दुबे के अनुसार इस वर्ष भैरव अष्टमी के दिन कई शुभ योग बन रहे हैं। इनमें पद्म योग, ब्रह्म योग, शुक्ल योग और रवि योग का संयोग रहेगा। इन योगों में भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव की उपासना करने से साधक को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। साथ ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
काल भैरव पूजा विधि
काल भैरव जयंती पर प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और काल भैरव जी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष पूजा करें। यदि मंदिर में पूजा कर रहे हैं, तो वहां चौमुखी दीपक जलाना शुभ माना गया है। इसके बाद भगवान भैरव को फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें। कालभैरव अष्टकम का पाठ करें और भैरव मंत्रों का जप करें।
भैरव जी को क्या अर्पित करें
भैरव भगवान को भोग के रूप में इमरती, पान और नारियल अर्पित करना शुभ होता है। इस दिन कुत्तों को रोटी खिलाने की परंपरा भी है, क्योंकि कुत्ता भगवान भैरव का वाहन माना जाता है। ध्यान रहे कि भैरव जी को तेल अर्पित नहीं करना चाहिए।
भक्ति से मिलता है निर्भय जीवन
मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ काल भैरव जयंती पर पूजा करता है, उसे जीवन में किसी प्रकार का भय नहीं रहता। भगवान भैरव की कृपा से साधक को निर्भयता, आत्मविश्वास और सफलता प्राप्त होती है। काल भैरव जी की उपासना जीवन में अनुशासन और दृढ़ता का संचार करती है, जिससे व्यक्ति धर्ममार्ग पर स्थिर रहता है।