
राकेश कुमार शर्मा
पन्ना। बुंदेलखंड के वनसमृद्ध जिले पन्ना में इन दिनों जंगल तेंदू फलों की बहार से महक रहे हैं। गोल आकार के पीले, आकर्षक और स्वादिष्ट तेंदू फल पेड़ों पर लदे हुए दिखाई दे रहे हैं, जो न केवल देखने में मनमोहक लगते हैं बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए जीवनयापन का महत्वपूर्ण साधन भी बने हुए हैं। तेंदू फल यहां के ग्रामीणों और आदिवासियों की आय का एक अहम आधार है। पन्ना टाइगर रिजर्व सहित जिले के उत्तर और दक्षिण वन मंडलों के जंगलों में तेंदू के पेड़ बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।
मार्च से मई तक आदिवासी समुदाय के लोग इन फलों का संग्रह करते हैं और स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें नियमित आय प्राप्त होती है। इसके बाद मई-जून में तेंदूपत्ता तुड़ाई का कार्य शुरू होता है। तेंदूपत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में किया जाता है, जिससे ग्रामीणों को अतिरिक्त रोजगार भी मिलता है और उनकी आजीविका को सहारा मिलता है।
घटते जंगल, लुप्त होते पारंपरिक फल
वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ती आबादी और खनन गतिविधियों के कारण तेंदू जैसे पारंपरिक वृक्षों की संख्या लगातार घटती जा रही है। कल्दा पठार जैसे क्षेत्रों में अब भी वनोपज की समृद्धि दिखाई देती है, लेकिन अवैध खनन और पत्थर खदानों का बढ़ता दबाव यहां की वन संपदा के लिए खतरा बनता जा रहा है।
शहर के पास भी दिखी प्रकृति की खूबसूरती
पन्ना शहर के निकट स्थित चौपड़ा मंदिर परिसर और किलकिला नदी के किनारे तेंदू के फलदार वृक्ष इन दिनों लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। मंदिर क्षेत्र संरक्षित होने के कारण यहां हरियाली और प्राकृतिक संतुलन अब भी कायम है, जिससे क्षेत्र में तेंदू के पेड़ों की भरपूर उपस्थिति दिखाई देती है।
संरक्षण की जरूरत
पन्ना के जंगलों में लहलहाते तेंदू वृक्ष केवल प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक ही नहीं हैं, बल्कि यह आदिवासी जीवन, आजीविका और पारंपरिक संस्कृति से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इन वनों और पारंपरिक फलों का संरक्षण किया जाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राकृतिक धरोहर और उससे मिलने वाले रोजगार के अवसरों का लाभ उठा सकें।