
जबलपुर। श्री राम जन्मोत्सव के पावन अवसर पर मदन महल स्थित श्री राम मंदिर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान उज्जैन के स्वामी भगवतानंद गिरी ने भगवान श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और श्रीराम के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा।

कथा के दौरान स्वामी भगवतानंद गिरी ने बताया कि प्राचीन काल में अयोध्या नगरी के राजा महाराज दशरथ अत्यंत पराक्रमी और धर्मपरायण शासक थे, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ी चिंता यह थी कि उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। इस कारण वे अत्यंत चिंतित रहते थे और राज्य के भविष्य को लेकर मन में व्याकुलता बनी रहती थी।
पुत्रेष्टि यज्ञ से हुआ दिव्य संतान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त
स्वामी जी ने कथा में बताया कि गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में महाराज दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए महान ऋषि ऋष्यश्रृंग के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन कराया। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने महाराज दशरथ को एक दिव्य खीर से भरा पात्र प्रदान किया। अग्निदेव ने कहा कि इस खीर को अपनी रानियों में बांट दें, इससे उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।
राजा दशरथ ने उस दिव्य खीर को अपनी तीनों रानियों—माता कौशल्या, माता कैकेयी और माता सुमित्रा में बांट दिया। कथा के अनुसार माता सुमित्रा को दो बार खीर प्राप्त हुई, जिसके कारण उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए।
चारों भाइयों के रूप में हुआ भगवान विष्णु का दिव्य अवतार
स्वामी भगवतानंद गिरी ने बताया कि समय आने पर माता कौशल्या ने भगवान श्रीराम को जन्म दिया, माता कैकेयी से भरत का जन्म हुआ और माता सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों भाइयों को भगवान विष्णु का अंश माना जाता है।
उन्होंने बताया कि भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र और मध्यान्ह काल में हुआ था। इसी कारण हर वर्ष इस दिन को पूरे देश में राम नवमी के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
धर्म स्थापना और रावण वध के लिए हुआ श्रीराम का अवतार
स्वामी जी ने कहा कि उस समय पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया था और रावण के अत्याचारों से देवता और ऋषि-मुनि भी पीड़ित थे। तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अयोध्या में श्रीराम के रूप में अवतार लिया, ताकि अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की जा सके।
कथा के दौरान स्वामी जी ने कहा कि भगवान श्रीराम केवल एक राजा नहीं बल्कि मर्यादा, आदर्श और धर्म के प्रतीक हैं। उनके जीवन से मानव समाज को सत्य, त्याग, कर्तव्य और आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।
इस अवसर पर मौजूद जगद्गुरु स्वामी नरसिंह देवाचार्य ने भी आशीर्वचन से लोगों को कथा के महत्व के बारे में बताया। कथा के समापन पर मंदिर परिसर में भगवान श्रीराम की आरती की गई और श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारों के साथ आशीर्वाद प्राप्त किया।