
जबलपुर। कार्तिक मास की एकादशी से पूर्णिमा के मध्य भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना के विशेष दिवस माने गए हैं। इस अवसर पर श्री नृसिंह मंदिर में श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के द्वितीय दिवस पर श्रीमद् जगदगुरू डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज ने भक्तों को अमृत वचन सुनाए। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करने मात्र से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो, कथा श्रवण से वह निष्पाप बन जाता है।
आत्मदेव ब्राह्मण की कथा का उल्लेख
स्वामी जी ने आत्मदेव ब्राह्मण की कथा का बर्णन करते हुए कहा कि जब उनके यहाँ कोई पुत्र नहीं हुआ तो वे अत्यंत दुखी होकर वन की ओर चले गए। वहाँ उनकी भेंट एक संन्यासी से हुई, जिन्होंने उन्हें तपः पूत फल प्रदान किया ताकि उन्हें संतान की प्राप्ति हो। आत्मदेव की पत्नी धुन्धुली ने वह फल स्वयं न खाकर गाय को खिला दिया, जिसके परिणामस्वरूप गोकर्ण जी का जन्म हुआ। धुन्धुली ने अपनी बहन के पुत्र को भी अपना बताया, जो धुन्धकारी नाम से अत्यंत अधर्मी और पापी बना।
कथा श्रवण से प्रेत योनि से मुक्ति
स्वामी जी ने आगे बताया कि धुन्धकारी की मृत्यु के बाद वह घोर प्रेत योनि में भटकता रहा, परंतु श्री गोकर्ण जी द्वारा श्रीमद् भागवत कथा के श्रवण से उसका उद्धार हो गया। इससे यह सिद्ध होता है कि भागवत कथा सुनने से आत्मा का कल्याण निश्चित होता है।
भागवत वेद-वेदांत का सार
स्वामी जी ने कहा कि श्रीमद् भागवत महापुराण वेद और वेदान्त का सार है। इसके श्रवण मात्र से सम्पूर्ण वेद-वेदान्त के श्रवण का पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने शास्त्रवचन उद्धृत किया — “सर्व वेदान्त सारं यद् श्रीमद् भागवतमिष्यते।” अर्थात् श्रीमद् भागवत का श्रवण करने से जीव के अन्तःकरण में भगवान की दिव्य भक्ति का उदय होता है और आत्मा परम आनन्द को प्राप्त करती है।
व्यासपीठ पूजन और विशिष्ट अतिथि
कथा के द्वितीय दिवस पर व्यास पीठ का पूजन श्रीमती कमलेश शुक्ल, शैलेन्द्र ज्योतिषी, सुनित, श्रद्धा और वंदना द्वारा किया गया। इस अवसर पर अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के कुलपति डॉ. राजेंद्र कुमार कुदरया, आचार्य नर्मदा प्रसाद शर्मा सहित बड़ी संख्या में भक्तजन उपस्थित रहे। वातावरण भक्ति भाव से सराबोर हो उठा और कथा श्रवण से सभी भक्तों ने आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया।