
राजीव उपाध्याय
हर त्योहार आस्था, उत्साह और सामूहिक सहभागिता का पर्व होता है, वह गणेशोत्सव हो या दुर्गोत्सव, लेकिन जब इसी उत्सव के पंडाल मौत का ठिकाना बन जाएं तो सवाल केवल हादसे का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का उठता है। पंडाल में मौत का करंट दौड़ने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। पिछले साल दुर्गोत्सव के दौरान हो या इस वर्ष गणेशोत्सव के दौरान पंडालों में करंट लगने से मौत की घटनाएं सामने आई हैं। जब घटनाएं घट जाती हैं तब बिजली विभाग और प्रशासन जागता है। पिछले साल जो घटनाएं घटीं, उससे ही सबक क्यों नहीं लिया जाता? यह सवाल उठना लाजमी है।
इस साल भी घटी घटनाएं
जबलपुर में एक पंडाल में करंट लगने से एक किशोर की मौत हो गई। किशोर की मौत के बाद बिजली विभाग जागा और टेंट हाउस संचालकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। वहीं मंडला में गणेश विसर्जन के बाद पंडाल में सो रहे चार युवकों की करंट लगने से मौत हो गई। सवाल यह है कि आखिर हर हादसे के बाद जागने वाला प्रशासन और बिजली विभाग हादसे से पहले क्यों नहीं जागता?
यह महज दुर्भाग्य नहीं कहा जा सकता। कई पंडालों में लोहे की संरचना, खुले विद्युत कनेक्शन, कटे-फटे तार, अमानक तार, कम ऊंचाई पर वायरिंग, एमसीबी और अर्थिंग की व्यवस्था नहीं होना, ज्वाइंट का सुरक्षित तरीके से इंसुलेटेड नहीं होना जैसे फॉल्ट होते हैं, जिन पर बिजली विभाग की नजर होना चाहिए। इन सबके बीच सुरक्षा के इंतजामों की अनदेखी किसी बड़े खतरे को आमंत्रण देने जैसी है।
यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी पंडालों में करंट फैलने से लोगों की जान जा चुकी है। पिछले वर्ष दुर्गोत्सव के दौरान भी करंट लगने की घटनाएं सामने आई थीं। यानी सिस्टम के सामने खतरे की तस्वीर पहले से मौजूद थी। फिर भी उससे सबक लेकर ऐसी स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई कि उत्सव के दौरान अस्थायी बिजली कनेक्शन और पंडालों की विद्युत सुरक्षा की अनिवार्य जांच हो?
पंडालों की लगातार जांच क्यों नहीं होती
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव जैसे आयोजनों के लिए पंडाल लगाए जाते हैं तो बिजली विभाग की जिम्मेदारी आखिर कहां खत्म हो जाती है? क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारी केवल बिजली कनेक्शन देने तक सीमित हैं? क्या यह जांच नहीं होनी चाहिए कि पंडाल में वायरिंग किस तरह की गई है, तार खुले तो नहीं हैं, अर्थिंग की व्यवस्था है या नहीं, लोहे की संरचना बिजली के संपर्क में आने की स्थिति में खतरा तो नहीं बनेगी?
हर साल त्योहार आते हैं। पंडाल सजते हैं। बिजली के कनेक्शन लिए जाते हैं। अधिकारी निरीक्षण के दावे करते हैं। बैठकें होती हैं। सुरक्षा निर्देश जारी होते हैं। फिर हादसा होता है और उसके बाद वही जांच, वही बयान और वही आश्वासन सामने आते हैं। कुछ दिनों तक जिम्मेदारी तय करने की बातें होती हैं और फिर मामला फाइलों में दब जाता है।
औपचारिक प्रक्रियाएं न हों
प्रशासन को यह तय करना होगा कि धार्मिक आयोजनों की अनुमति केवल औपचारिक प्रक्रिया न बने। पंडाल लगाने से पहले विद्युत सुरक्षा का प्रमाणन, उचित अर्थिंग, सुरक्षित वायरिंग, एमसीबी/आरसीसीबी जैसी सुरक्षा व्यवस्था और बारिश के दौरान विद्युत आपूर्ति को लेकर स्पष्ट प्रोटोकॉल अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही जिम्मेदार विभागों की संयुक्त टीम को पंडालों का मौके पर निरीक्षण करना चाहिए।
परिवारों पर जिंदगीभर का दुख
त्योहार कुछ दिनों के होते हैं, लेकिन एक परिवार पर टूटने वाला दुख पूरी जिंदगी रहता है। जबलपुर में एक किशोर की मौत व मंडला में चार युवकों की मौत केवल आंकड़े नहीं हैं। ये उन परिवारों की जिंदगी के उजड़ने की कहानी है, जिन्हें शायद थोड़ी सी सतर्कता और जिम्मेदारी बचा सकती थी।
जवाबदेही तय हो
आस्था के पंडालों में अगर मौत का करंट दौड़ता रहे और सिस्टम केवल हादसे के बाद अपनी आंखें खोले, तो इसे लापरवाही नहीं तो और क्या कहा जाएगा? अब जरूरत बयानबाजी की नहीं, जवाबदेही की है। बिजली विभाग और प्रशासन को यह बताना होगा कि पंडालों की सुरक्षा जांच वास्तव में हुई थी या सिर्फ कागजों में?
भक्ति के आयोजनों में सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, जिम्मेदारी है। और जब जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही हो, तो सवाल उठेंगे—तीखे सवाल उठेंगे।