
राजीव उपाध्याय, जबलपुर
कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं, लेकिन अब इसका नया अखाड़ा है — मंच पोस्टर से लेकर कुर्सियों की कतार तक, हर जगह खींचतान। मंच पर कौन बैठे और कौन नहीं, यह तय करने में जितना समय जाता है, उतना शायद भाषण की तैयारी में भी नहीं लगता।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इस खींचतान से इतने परेशान हुए कि उन्होंने ऐलान कर दिया — अब कभी मंच पर नहीं बैठेंगे। मामला उस दिन का है जब कांग्रेस के एक कार्यक्रम में मंच पर सीट को लेकर नेताओं में तकरार हो गई थी। नाराज दिग्विजय तब से मंच छोड़कर कार्यकर्ताओं के बीच बैठने लगे।
भोपाल में सिंधिया ने तोड़ी ‘नो स्टेज पॉलिसी’
भोपाल के एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिग्विजय को सामने की पंक्ति में देखा। वे खुद नीचे आए, उनका हाथ थामा और मंच पर ले गए। बस, फिर क्या था — कांग्रेस खेमे में सवालों की फुहार — “पार्टी नेताओं की बात पर मंच से दूर, लेकिन सिंधिया के बुलावे पर मंच पर क्यों?”
ग्वालियर में पुरानी परंपरा का हवाला दिग्विजय ने मीडिया से कहा कि — “कांग्रेस में कभी नेताओं के मंच पर बैठने की परंपरा नहीं थी। सिर्फ जिला अध्यक्ष और मुख्य अतिथि मंच पर होते थे, बाकी सब नीचे। मैंने यह परंपरा शुरू नहीं की, बस उसका पालन कर रहा हूं।” उन्होंने कहा कि “मैंने माधवराव सिंधिया के साथ काम किया। ज्योतिरादित्य मेरे लिए बेटे जैसे हैं। वे कांग्रेस क्यों छोड़ गए, यह वे जानें, लेकिन स्नेह वही है। भोपाल में वे मुख्य अतिथि थे और मुझे देखकर मंच पर ले गए।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के भीतर मंच पर बैठने को लेकर इतनी खींचतान है कि एक पूर्व मुख्यमंत्री को भी दूरी बनानी पड़ी। लेकिन सिंधिया संग बैठे दिग्विजय की तस्वीर ने फिर वही सवाल हवा में छोड़ दिया — कांग्रेस में असली लड़ाई विचारधारा की है, या मंच की….?
फोटो: सोशल मीडिया