स्वर्गीय डॉ. मनोज कुमार पाराशर : ज्ञान, सेवा और सिद्धांतों की प्रेरणादायी विरासत

असाधारण प्रतिभा से चिकित्सा जगत तक बनाई अलग पहचान

जबलपुर। स्वर्गीय डॉ. मनोज कुमार पाराशर का जीवन चिकित्सा सेवा, शिक्षा, ज्ञान, ईमानदारी और सिद्धांतों के प्रति समर्पण की ऐसी प्रेरणादायी मिसाल रहा, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। वे एक विलक्षण चिकित्सक होने के साथ-साथ समर्पित शिक्षक और स्पष्टवादी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां और चिकित्सा क्षेत्र में योगदान अपने आप में उल्लेखनीय रहे।

शिक्षा के प्रति बचपन से रहा लगाव

डॉ. मनोज कुमार पाराशर का जन्म 16 सितंबर 1951 को सागर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता प्रोफेसर हरिशंकर पाराशर जी.एस. कॉमर्स कॉलेज में वाणिज्य के प्राध्यापक थे। चार भाइयों और दो बहनों के बीच पले-बढ़े डॉ. पाराशर को बचपन से ही शिक्षा और संस्कारों का समृद्ध वातावरण मिला।

वर्ष 1967 में उन्होंने मॉडल हाई स्कूल से शिक्षा पूरी की और मध्य प्रदेश में बायोलॉजी ग्रुप में सर्वोच्च स्थान हासिल किया। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें शिक्षण में भी विशेष रुचि थी। वे स्कूल के दिनों में पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे।

मेडिकल शिक्षा में बनाया स्वर्णिम रिकॉर्ड

वर्ष 1968 में उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, जबलपुर में प्रवेश लिया। वर्ष 1973 में एमबीबीएस और 1977 में एमडी की उपाधि प्राप्त की।

मेडिकल छात्र के रूप में भी उनकी प्रतिभा लगातार सामने आती रही। उनकी उपलब्धियों को उस समय एक समाचार पत्र ने “Brilliant Student” शीर्षक से प्रकाशित किया था। उन्होंने एक ही वर्ष में पांच स्वर्ण पदक हासिल कर जबलपुर विश्वविद्यालय के इतिहास में उल्लेखनीय कीर्तिमान स्थापित किया।

वे चिकित्सा संकाय में शीर्ष स्थान पर रहे और फिजियोलॉजी, पैथोलॉजी, मेडिसिन तथा सर्जरी में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। उन्हें जबलपुर विश्वविद्यालय गोल्ड मेडल के अलावा स्वर्गीय हीरालाल पोवार, स्वर्गीय श्रीमती महादेवी गुप्ता, डॉ. एम.के. पाठी और स्वर्गीय श्री गोविंदराम पटेरिया से संबंधित स्मृति स्वर्ण पदकों से भी सम्मानित किया गया। फाइनल एमबीबीएस में मेडिसिन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने पर उन्हें Pfizer और Merck Gold Medals भी मिले।

देश-विदेश में दी चिकित्सा सेवाएं

उच्च शिक्षा के बाद डॉ. पाराशर ने नई दिल्ली स्थित एम्स में नेफ्रोलॉजी के सीनियर रेजिडेंट के रूप में सेवाएं दीं। वर्ष 1979 से 1984 तक वे ग्वालियर मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे। इसके बाद 1984 से 1989 तक उन्होंने त्रिपोली, लीबिया के Al-Fatah University Central Hospital में Consultant के रूप में कार्य किया।

बाद में वे अपने ही संस्थान एनएससीबी शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, जबलपुर से जुड़े और मेडिसिन विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने कई वर्षों तक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) इंस्पेक्टर के रूप में भी महत्वपूर्ण दायित्व निभाया और विभिन्न मेडिकल कॉलेजों की मान्यता एवं स्वीकृति की प्रक्रिया में योगदान दिया। इसके अलावा उन्होंने सुख सागर मेडिकल कॉलेज में Consultant Medicine और Dean के रूप में भी सेवाएं प्रदान कीं।

हमेशा खुद को विद्यार्थी माना, ज्ञान बांटना रहा उद्देश्य

अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद डॉ. पाराशर स्वयं को जीवनभर विद्यार्थी मानते रहे। किसी भी विषय पर व्याख्यान देने से पहले वे पूरी तैयारी करते थे। उनके लिए सीखना और सिखाना जीवन का अभिन्न हिस्सा था।

चिकित्सा के अलावा सामाजिक एवं समसामयिक विषयों और विदेश में अपने अनुभवों को भी वे विद्यार्थियों, सहकर्मियों और परिवार के साथ साझा करते थे। उनका मानना था कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसे आगे बढ़ाया जाए।

ईमानदारी और सिद्धांतों से कभी नहीं किया समझौता

डॉ. पाराशर के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं में कठोर परिश्रम, ईमानदारी और स्पष्टवादिता शामिल थीं। उनके लिए सही कार्य करना व्यक्तिगत लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। वे अपने सिद्धांतों से समझौता करने में विश्वास नहीं रखते थे और किसी भी विषय पर अपनी बात बिना लाग-लपेट के स्पष्ट रूप से रखने के लिए जाने जाते थे।

परिवार में भी आगे बढ़ी चिकित्सा सेवा की परंपरा

डॉ. पाराशर की पत्नी डॉ. नमिता पाराशर भी एनएससीबी मेडिकल कॉलेज से जुड़ी रहीं। उनकी दोनों बेटियां डॉ. अनुश्री पाराशर और डॉ. अदिति पाराशर ने भी इसी संस्थान से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। दोनों पिछले 15 से अधिक वर्षों से संयुक्त राज्य अमेरिका में चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे रही हैं।

विद्यार्थियों और आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहेगी विरासत

डॉ. मनोज कुमार पाराशर की विरासत केवल उनके स्वर्ण पदकों, पदों और उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उनकी वास्तविक विरासत उन विद्यार्थियों में है, जिन्हें उन्होंने पढ़ाया; उन सहकर्मियों में है, जिन्हें उन्होंने मार्गदर्शन दिया और उस परिवार में है, जिसे उन्होंने ईमानदारी, ज्ञान और कर्तव्यनिष्ठा के संस्कार दिए।

आज वे भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सीख, उनके संस्कार और उनके द्वारा साझा किया गया ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। स्वर्ण पदक इतिहास में दर्ज होते हैं, लेकिन एक सच्चे शिक्षक का ज्ञान और सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति के संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। यही स्वर्गीय डॉ. मनोज कुमार पाराशर की सबसे बड़ी विरासत है।

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