
राजीव उपाध्याय
नामांकन रद्द के मुद्दे पर कांग्रेस जनता की सहानुभूति हासिल करने में असफल रही है। पार्टी के भीतर ही इतनी तल्खी नजर आती है कि किसी भी मुद्दे पर एकजुटता दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि अपने खिलाफ बने मुद्दे को भी कांग्रेस न तो प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचा पा रही है और न ही उससे राजनीतिक लाभ ले पा रही है।
मध्यप्रदेश से राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने का मामला भी पार्टी सही तरीके से जनता के बीच नहीं ले जा सकी। इस मुद्दे पर विरोध की आवाज भोपाल तक सीमित रही और अन्य जिलों में यह मुखर रूप से नहीं उठ सकी। जिलों के पदाधिकारियों ने यह मान लिया कि विरोध भोपाल या दिल्ली में ही हो जाए, वही पर्याप्त है। यह स्थिति संगठन की कमजोरी को दर्शाती है।
भाजपा पहले से थी तैयार
राज्यसभा चुनाव में मध्यप्रदेश की तीनों सीटों को लेकर भाजपा की रणनीति बेहद मजबूत थी। भाजपा को तीसरी सीट के लिए केवल कांग्रेस के उम्मीदवार के नाम का इंतजार था। उसी के अनुसार उसकी रणनीति ‘प्लान ए’ और ‘प्लान बी’ तैयार थी।
पूर्व राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह पहले ही चुनाव में जाने से इनकार कर चुके थे, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम भी चर्चा में था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कमलनाथ उम्मीदवार होते तो भाजपा तीसरी सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारती। लेकिन जैसे ही मीनाक्षी नटराजन का नाम घोषित हुआ, भाजपा सक्रिय हो गई और उसे इस सीट पर जीत का भरोसा हो गया।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि हैदराबाद कोर्ट के नोटिस से जुड़ी जानकारी भाजपा तक कैसे पहुंची। इससे कांग्रेस के भीतर ही अंदरूनी लीक की आशंका जताई जा रही है।
अंदरूनी मतभेद उजागर
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के बीच मतभेद भी सार्वजनिक रूप से नजर आए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दोनों के बीच तालमेल की कमी चर्चा का विषय बनी। दिग्विजय सिंह ने प्रेस से संवाद करने से इनकार कर दिया, जबकि प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने उन्हें कई बार आमंत्रित किया था।
इसी तरह कमलनाथ और अजय सिंह राहुल की भी सक्रियता इस मुद्दे पर अपेक्षित नहीं दिखी। इससे पार्टी के भीतर समन्वय की कमी साफ नजर आई।
संगठनात्मक कमजोरी उजागर
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के प्रदेश संगठन की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। यह सवाल उठ रहा है कि पार्टी इस मुद्दे को बड़ा जनआंदोलन क्यों नहीं बना सकी। क्या मीनाक्षी नटराजन की छवि को जनता के सामने प्रभावी ढंग से रखा गया?
कांग्रेस इस मुद्दे को नारी सशक्तिकरण से जोड़ सकती थी और यह संदेश दे सकती थी कि एक महिला उम्मीदवार के साथ अन्याय हुआ है। लेकिन पार्टी इस दिशा में भी पहल नहीं कर सकी।
वहीं भाजपा ने इस पूरे मामले को कांग्रेस की आंतरिक राजनीति से जोड़ते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी के भीतर ही कुछ लोग नहीं चाहते थे कि मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा पहुंचें।
अब यह देखना होगा कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस पूरे मामले को किस तरह लेता है और भविष्य में संगठन को मजबूत करने के लिए क्या रणनीति अपनाता है।