मकर संक्रमण व्याख्यानमाला में वीर सावरकर के साहित्य की कालजयी प्रासंगिकता पर व्याख्यान

जबलपुर। मराठी साहित्य अकादमी एवं दत्त भजन मंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मकर संक्रमण व्याख्यानमाला के अंतर्गत आज मुंबई से पधारे श्री नरेंद्र पाठक द्वारा “वीर सावरकर का साहित्य: कल, आज और कल” विषय पर सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि वीर सावरकर का साहित्य सर्वदा प्रासंगिक रहा है और भविष्य में भी प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

महाकवि थे वीर सावरकर

अपने उद्बोधन में श्री नरेंद्र पाठक ने बताया कि वीर सावरकर एक महाकवि थे और उनका समग्र साहित्य कालसापेक्ष होने के साथ-साथ कालजयी भी है। सावरकर ने मराठी भाषा में 10,000 से अधिक पृष्ठों का साहित्य तथा अंग्रेजी भाषा में 1500 से अधिक पृष्ठों का साहित्य सृजित किया। मराठी साहित्य में बहुत कम ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने इतना मौलिक और व्यापक लेखन किया हो।

लोकप्रिय कविताएं और नाटक

उन्होंने कहा कि वीर सावरकर की “सागरा प्राण तळमळला”, “हे हिन्दु नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा”, “जयोस्तुते”, “तानाजीचा पोवाडा” जैसी कविताएं आज भी अत्यन्त लोकप्रिय हैं। इसके साथ ही गझल “उषा:प” तथा उनके नाटक भी मराठी साहित्य जगत में विशेष स्थान रखते हैं।

40 पुस्तकों में संकलित साहित्य

वक्ता ने जानकारी दी कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर की 40 पुस्तकें वर्तमान में बाजार में उपलब्ध हैं। उनके साहित्य में दूरदृष्टि, दाहकता, शीतलता और वीरता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यही कारण है कि उनका वाङ्मय सर्वकालीन और प्रेरणादायी माना जाता है।

लोकमान्य तिलक की प्रतिमा पर माल्यार्पण

कार्यक्रम का शुभारंभ श्री अभय गोरे एवं नितीन देसाई द्वारा लोकमान्य तिलक की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया। इसके पश्चात अतिथि वक्ता श्री नरेंद्र पाठक का स्वागत सदानंद गोडबोले, डॉ. शिरीष नाईक, विजय भावे, भास्कर वर्तक, वर्षा दांडेकर एवं अभय गोरे द्वारा श्रीफल एवं शाल भेंट कर किया गया।

गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति

कार्यक्रम का मंच संचालन एवं आभार प्रदर्शन विश्वास पाटणकर ने किया। इस अवसर पर संतोष गोडबोले, शरद आठले, डा. माणिक पांसे, डा. अर्चना मुठे, दिलीप सप्रे सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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