युग-युगांतर में जन्म लेती हैं ऐसी विभूति

ब्रम्हलीन जगद् गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की 103 वीं जयंती पर विशेष

हरतालिका तीज को 103 वर्ष पहले 1923 में धरा पर अवतरित हुए द्वि-पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज को ब्रम्हलीन हुए 3 वर्ष 3 दिन हो गए हैं। उन्होंने सनातन धर्म के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। उनका कृतित्व इतना महान है कि उसे देखा जाए तो यह कहना अतिशयुक्ति नहीं होगा कि उनके जैसी विभूति युगों-युगांतर में धरा पर आती हैं।

भगवान आद्य शंकराचार्य के द्वारा ढाई हजार साल पहले भारत भूमि पर जिस समय अवतार लिया था वह वक्त सनातन धर्म के लिए संकट काल था, बौद्ध धर्म पांव पसार रहा था, सनातन धर्म पतन को प्राप्त था। ऐसे में उन्होंने न सिर्फ सनातन धर्म की पुर्नस्थापना की अपितु देश को चारों दिशाओं में चार पीठ बनाकर उन पर अपने चार शिष्यों को आचार्य बनाया ये परंपरा अब तक कायम है और पूर्व में पूर्वाम्नाय गोवर्धन पीठ, पश्चिम में द्वारका-शारदा पीठ, उत्तर में बद्रीनाथ और दक्षिण में श्रृंगेरी पीठ में नियुक्त होने वाले आचार्य ही शंकराचार्य कहलाए। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती देश के पहले ऐसे शंकराचार्य हुए हैं जिन्होंने इन 4 सर्वमान्य पीठों में से दो पीठों पर आसीत होकर द्विपीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य की उपाधि प्राप्त की।

देश को दी दिशा, सनातन का परचम फहराया

बचपन से वे सन्यास की ओर उन्मुख थे। अल्पायु में उन्हें रामचरित मानस कंठस्थ हो चुकी थी। अपने साथ हमेशा पोथी रखते थे जिसके कारण उनका नाम उनके पिता धनपतराय उपाध्याय और माता गिरिजा देवी ने अपने गुरू से पूछकर पोथीराम रख दिया। अल्पायु में ही वे साधु मंडली के साथ बनारस चले गए। जब वे त रुण अवस्था में थे उस वक्त देश में स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में उतर पड़े। उनके युवा मन में क्रांतिकारियों का बलिदान ने बड़ा प्रभाव डाला था, अंग्रेजों की नाक में दम करते हुए पोस्ट ऑफिस लूटकर ग्रामीणों में बांट देना, रेल की पटरियां उखाड़ने जैसे काम किए।

मुखबिरी में पकड़े गए और 3 बार जेलयात्राएं भी कीं। देश की स्वतंत्रता के बाद गौ सेवा और यायावरी जीवन अपनाया धर्म का प्रचार करते रहे। 1973 में बद्रीनाथ के तत्कालीन शंकराचार्य के ब्रम्हलीन होने के उपरांत भारत धर्म महामंडल व तत्कालीन बाकी पीठों के शंकराचार्य वृंदों ने उन्हें ज्योतिष्पीठाधीश्वर बदरीकाश्रम का शंकराचार्य पद पर अभिषेक कर घोषित किया। इसके उपरांत वर्ष 1984 में द्वारका शारदा पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य अभिनव विद्यातीर्थ महाराज की इच्छाअनुसार उन्हें द्वारका-शारदा पीठ का शंकराचार्य बनाया गया। इस तरह वे देश के पहले दो पीठों पर आसीत पहले शंकराचार्य बने।

राम मंदिर की राह प्रशस्त की

राजनीतिक कारणों से भले ही उन्हें राम मंदिर का श्रेय न मिले मगर ये न्यायालय के दस्तावेजों से जाना जा सकता है कि राम मंदिर के प्रमाण उपलब्ध करवाने में और इसकी कानूनी लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। सनातन धर्म के खिलाफ या प्रतिकूल केन्द्रीय सरकार के निर्णयों में विरोध करने वाले वे सबसे पहले खड़े होते आए हैं। चाहे राम के अस्तित्व पर उठाए गए सवाल हों या रामसेतु को नकारने वाली बातें वे तत्कालीन कांग्रेस की यूपीए सरकार के खिलाफ रहे। समाज की असहाय, परित्यक्त और विधवा महिलाओं को समाज में सम्मान के साथ पुर्नस्थापित करने के लिए अखिल भारतीय उभय भारती महिला आश्रम की स्थापना की।

वह स्नेह भरी नजरें अब नहीं

सनातन धर्म के धर्म सम्राट होते हुए भी उनका सहज और सरल व्यक्तित्व अविस्मरणीय रहेगा। उनकी स्नेहभरी नजरें जब किसी अनजान और परिचित पर भी पड़तीं तो वह कृतार्थ हो जाता। जीवन के अंतिम समय तक भी वे सनातन धर्म के प्रति समर्पित रहे। अब उनकी स्नेह भरी नजरें भौतिक संसार में भले ही न हों पर हम सभी के जीवन में हमेशा उनका अस्तित्व बना रहेगा।

भवदीय
डॉ. सुश्री कल्याणी पाण्डेय
पूर्व महापौर-विधायक

Back to top button