भागवत कथा में जीवन को सार्थक बनाने का संदेश, सत्संग से मिलता है शांति का मार्ग

जबलपुर। इस दुनिया में हर यात्रा पर जाने से पहले हम बहुत सारी तैयारियां करते हैं, लेकिन जीवन की सबसे लंबी यात्रा में शामिल होने के लिए हम कोई तैयारी नहीं करते। जीवन में सत्संग करना चाहिए। सत्संग, सुसंग और संस्कारों की बात करते ही सभी कहते हैं कि बाद में कर लेंगे।

सभी को अपना जन्मदिन पता है, लेकिन मृत्यु की तिथि निश्चित नहीं है। सभी सत्कर्म करने के लिए कहते हैं कि बाद में कर लेंगे, लेकिन यदि तुरंत मृत्यु आ जाए तो क्या करोगे? इसलिए हर कार्य सार्थकता के साथ करना चाहिए। भागवत कथा का श्रवण जीवन के श्रेष्ठ कार्यों में से एक है। सत्संग जितना अधिक करेंगे, उतना ही हम जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की ओर बढ़ते हैं।

सत्संग कल्पवृक्ष और पारस पत्थर से भी श्रेष्ठ

सत्संग सुनना, उसका मनन करना और उसे समझना कल्पवृक्ष और पारस पत्थर से भी श्रेष्ठ है। पैसे से सुख नहीं खरीदा जा सकता। शांति और स्थिरता का अनुभव सत्संग से ही मिलता है। परम शांति और सुख का अनुभव पैसे से नहीं, बल्कि सत्संग में बैठकर जीवन के वास्तविक सुख को समझने से मिलता है।

भागवत जीवन को सार्थक करने का भाव

भागवत जीवन को सार्थक करने का भाव है। गुरु के वचन में विश्वास होना अति आवश्यक है। मन, वचन और कर्म से दीनता का भाव होना चाहिए। कथा में लगाव और प्रेम होना चाहिए। जब कथा के प्रति आपका लगाव होगा तो मन लगेगा और आत्मा एवं शरीर भी पूर्णतः कथा के प्रति समर्पित होंगे।

यदि आपको जीवन में सुखी रहना है तो भगवान का आश्रय लेना चाहिए। भगवान के आश्रय से जीवन में शांति, स्थिरता और सार्थकता का अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।

श्रावण मास महोत्सव में आयोजित हुआ सत्संग

पूज्य दिव्य मनन स्वामी जी ने स्वामी नारायण संस्थान के प्रमुख पूज्य गुरुवर श्रीमहंत स्वामी जी के जन्म स्थान जबलपुर में श्रावण मास महोत्सव के अवसर पर आयोजित सत्संग में उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने श्रद्धालुओं को सत्संग के महत्व और जीवन को सार्थक बनाने के लिए आध्यात्मिक मार्ग अपनाने का संदेश दिया।

इस अवसर पर स्वामी मुनि दर्शन जी, डॉ. राजेश धीरावाणी, कमलेश अग्रवाल, संदीप विजन, लालू जैन, आज़ाद साहू, विध्येश भापकर सहित श्रद्धालु भक्तों की उपस्थिति रही।

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