भगवान का साथ होने से हल होते हैं कष्ट और संकट: स्वामी दिव्यमनन्ददास

जबलपुर। विश्वास के साथ जब हम किसी का हाथ पकड़ लेते हैं तो ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी निर्भीकता से आगे बढ़ते हैं। उसी प्रकार यदि परमात्मा श्रीहरि पर पूर्ण विश्वास कर लिया जाए तो जीवन में कोई भी संकट बड़ा नहीं लगता। मनुष्य निरंतर जीवन पथ पर आगे बढ़ता रहता है और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त करता है। यह विचार पूज्य संत दिव्यमनन्ददास स्वामी जी ने बीएपीएस श्री स्वामिनारायण मंदिर, रसल चौक में आयोजित श्रीमद्भागवत संत पारायण आध्यात्मिक आयोजन में व्यक्त किए।

परम पूज्य महंत स्वामी जी महाराज की प्रेरणा से आयोजित इस आध्यात्मिक आयोजन में श्रीमद्भागवत कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन में भक्ति, विश्वास, संत संग और आध्यात्मिक साधना के महत्व का संदेश दिया गया। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संत के श्रीमुख से भगवान की महिमा और जीवन को सार्थक बनाने वाले आध्यात्मिक विचारों का श्रवण किया।

भगवान पर विश्वास से दूर होता है भय

स्वामी दिव्यमनन्ददास जी ने कहा कि जिस प्रकार किसी विश्वसनीय व्यक्ति का हाथ थाम लेने के बाद कठिन रास्तों पर भी व्यक्ति को भय नहीं रहता, उसी प्रकार भगवान श्रीहरि का हाथ थाम लेने पर जीवन की कठिनाइयां भी छोटी लगने लगती हैं। परमात्मा पर पूर्ण विश्वास मनुष्य के भीतर साहस, धैर्य और सकारात्मकता का संचार करता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-दुख, उतार-चढ़ाव और संकट आते रहते हैं, लेकिन भगवान की शरण में रहने वाला व्यक्ति परिस्थितियों से घबराता नहीं है। वह अपने कर्म करते हुए विश्वास के साथ आगे बढ़ता रहता है। भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा जीवन को सही दिशा देने के साथ मन को स्थिरता प्रदान करती है।

संत और सत्संग से होता है आंतरिक शुद्धिकरण

स्वामी दिव्यमनन्ददास जी ने गंगा का उदाहरण देते हुए कहा कि गंगा सभी के पाप और आसुरी वृत्तियों को स्नान मात्र से नष्ट कर देती है। वह सभी के पापों को धोकर स्वयं मैली हो जाती है, लेकिन परमात्मा की भक्ति करने वाले संत-महात्माओं के गंगा स्नान से गंगा पुनः पवित्र हो जाती है। उन्होंने कहा कि संतों का जीवन स्वयं में पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि संत-महात्माओं की भूमि जबलपुर में हमारा जन्म हुआ है। जब हमें सच्चे संतों का सानिध्य प्राप्त होता है तो उनके मार्गदर्शन से व्यसनों से मुक्ति मिलने के साथ व्यक्ति का आत्मिक शुद्धिकरण भी होता है। संत और सत्संग मनुष्य को भीतर से स्वच्छ करने का कार्य करते हैं।

अपने ही क्रोध, लोभ और मोह से परेशान होता है मनुष्य

संत दिव्यमनन्ददास जी ने कहा कि बाहरी दुनिया हमें उतना परेशान नहीं कर सकती, जितना हमारे भीतर मौजूद क्रोध, लोभ, मोह और मद हमें परेशान करते हैं। मनुष्य को इन आंतरिक विकारों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। जब व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है, तभी वास्तविक शांति का अनुभव होता है।

उन्होंने कहा कि भगवान और संत की कृपा से मनुष्य क्रोध, व्यसन और दुर्व्यवहार से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है। भगवान और संत की शरण में आने से व्यक्ति आंतरिक और व्यावहारिक रूप से शुद्ध होता है। सच्चे संत मनुष्य को उसके व्यसनों और गलत व्यवहारों से मुक्ति दिलाकर जीवन को सही मार्ग पर ले जाने का कार्य करते हैं।

संत देते हैं निष्काम कर्म का जीवन मंत्र

स्वामी दिव्यमनन्ददास जी ने कहा कि संतों का जीवन मंत्र है कि लौकिक कर्म करते रहिए, लेकिन फल की चिंता में स्वयं को न बांधें। मनुष्य को अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करते रहना चाहिए। कर्म के परिणाम की अत्यधिक चिंता व्यक्ति के मन को अशांत करती है।

उन्होंने कहा कि पद, प्रतिष्ठा, मान और सम्मान से केवल ऊपरी सुख प्राप्त होता है। यदि हृदय में शांति नहीं है तो बाहरी उपलब्धियां भी व्यक्ति को पूर्ण संतुष्टि नहीं दे सकतीं। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने से आत्मिक शांति और वास्तविक समृद्धि का अनुभव होता है।

भगवान के साक्षात्कार से जीवन को मिलती है सार्थकता

संत दिव्यमनन्ददास जी ने कहा कि जीवन में वास्तविक सार्थकता का अनुभव प्राप्त करने के लिए भगवान का साक्षात्कार होना चाहिए। मनुष्य का जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों और सांसारिक सुखों तक सीमित नहीं है। आध्यात्मिक चेतना के जागरण से जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ में आता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को भगवान की भक्ति, संतों के सानिध्य और सत्संग को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य भगवान और संत की शरण में जाता है तो उसके भीतर सकारात्मक परिवर्तन प्रारंभ होता है और वह अपने जीवन को अधिक शांत, संयमित और सार्थक बना पाता है।

सुख, शांति और सद्भाव की कामना

श्रीमद्भागवत संत पारायण आध्यात्मिक आयोजन के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, सत्संग और आध्यात्मिक जीवन का संदेश दिया गया। आयोजन के समापन अवसर पर प्रभु से प्रार्थना की गई कि सभी के जीवन में सुख, शांति, सद्भाव एवं आध्यात्मिक चेतना का निरंतर संचार होता रहे।

इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने संतों के आशीर्वचन और श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया। मंदिर परिसर में पूरे आयोजन के दौरान भक्तिमय वातावरण बना रहा।

रिपोर्ट: विध्‍येश भापकर

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