
जबलपुर। गीताधाम में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के विश्राम दिवस पर कथा व्यास श्रीमद् जगतगुरु नृसिंह पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण एवं उनके परम मित्र सुदामा जी के चरित्र का अत्यंत भावपूर्ण और मार्मिक वर्णन किया। सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और पूरा वातावरण भक्ति एवं भावनाओं से भर गया।
महाराज श्री ने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता संसार के लिए सच्चे प्रेम, विश्वास, समानता और निस्वार्थ संबंध का अद्भुत उदाहरण है। बाल्यकाल में दोनों ने गुरुकुल में साथ शिक्षा प्राप्त की और कठिन परिस्थितियों में भी एक-दूसरे का साथ निभाया। समय बीतने के बाद भगवान श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बने, जबकि सुदामा अत्यंत साधारण जीवन व्यतीत करते रहे, लेकिन दोनों के बीच प्रेम और आत्मीयता में कभी कोई कमी नहीं आई।
प्रेम से लाई भेंट को भगवान ने सहर्ष स्वीकार किया
कथा में सुदामा जी की पत्नी द्वारा उन्हें भगवान श्रीकृष्ण से मिलने के लिए प्रेरित करने का प्रसंग सुनाया गया। सुदामा जी अपने मित्र के लिए भेंट स्वरूप पोहा/चिउड़ा लेकर द्वारका पहुंचे। द्वारका के राजमहल में जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण को अपने बालसखा सुदामा के आने का समाचार मिला, वे स्वयं उनका स्वागत करने के लिए दौड़ पड़े। भगवान ने सुदामा को गले लगाया और अत्यंत प्रेम एवं सम्मान के साथ उनका स्वागत किया।
महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सुदामा के चरण पखारने के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान के लिए भक्त की सामाजिक स्थिति, धन-दौलत या बाहरी वैभव का कोई महत्व नहीं है। भगवान केवल भक्त के प्रेम और भाव को देखते हैं। सुदामा जी द्वारा प्रेमपूर्वक लाई गई भेंट को भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े आनंद से स्वीकार किया।
सच्ची मित्रता में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं
कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की पुरानी गुरुकुल की स्मृतियों का भी सुंदर वर्णन किया गया। दोनों मित्रों के बीच हुए संवाद और भगवान द्वारा सुदामा पर बरसाए गए प्रेम को सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। महाराज श्री ने कहा कि सच्ची मित्रता वही है जिसमें स्वार्थ का कोई स्थान न हो और सुख-दुःख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का भाव हो।
बिना मांगे ही भगवान ने प्रदान की सुख-समृद्धि
सुदामा जी ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने लिए कुछ नहीं मांगा। वे अपने मित्र के दर्शन मात्र से संतुष्ट होकर द्वारका से वापस लौट आए। भगवान श्रीकृष्ण ने भी सुदामा के प्रेम को समझते हुए बिना मांगे ही उनके जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान कर दी। जब सुदामा अपने घर पहुंचे तो वहां उनकी कुटिया के स्थान पर सुंदर भवन और समृद्धि देखकर वे भगवान की कृपा को समझकर भावविभोर हो गए।
भगवान के दरबार में धन नहीं, भाव की प्रधानता
महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि भगवान के दरबार में धन नहीं, भाव की प्रधानता होती है। मनुष्य यदि सच्चे हृदय से भगवान का स्मरण करे और अपने जीवन में प्रेम, सेवा, विनम्रता तथा सदाचार को अपनाए तो उसका जीवन सार्थक हो सकता है। सुदामा चरित्र हमें यह भी सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पर विश्वास और अपनी मर्यादा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।