संगीत बन गया “शोर”, हार्ट पर पड़ रहा “जोर”

तेज आवाज से सुनने की क्षमता पर असर, बढ़ सकता है तनाव और ब्लड प्रेशर; हृदय रोगियों व बच्चों-बुजुर्गों को सावधानी की सलाह

राजीव उपाध्याय

जबलपुर। संगीत दिल को सुकून देता है, लेकिन जब यह शोर बन जाए तो यह दिल को बेचैन कर देता है। कुछ इसी तरह त्योहारों, धार्मिक आयोजनों, विवाह समारोहों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में तेज आवाज में बजाया जाने वाला संगीत जिस साउंड सिस्टम से प्ले किया जाता है, उसका असर आम जनता के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बहुत अधिक आवाज और लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे स्पष्ट असर सुनने की क्षमता व हार्ट पर पड़ता है। वहीं, लगातार और अत्यधिक शोर के कारण तनाव, नींद में बाधा जैसी समस्याओं से पीड़ित मरीज भी डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार हालांकि तेज साउंड का सीधा प्रभाव व्यक्ति, शोर की तीव्रता और उसके संपर्क की अवधि पर निर्भर करता है। तेज आवाज अकेले ही किसी व्यक्ति में हृदय रोग का सीधा कारण मानी जाए, ऐसा नहीं है। शोर के साथ तनाव, नींद में कमी और अन्य पर्यावरणीय कारक भी भूमिका निभा सकते हैं। जोखिम व्यक्ति की परिस्थितियों और लंबे समय तक शोर के संपर्क पर निर्भर करता है। डॉक्टर्स के अनुसार पहले से हृदय या रक्तचाप की समस्या वाले लोगों को अत्यधिक शोर से विशेष रूप से बचने की सलाह दी जाती है।

कान के नर्वस सिस्टम पर असर

हृदय रोग विशेषज्ञ व मप्र मेडिकल एवं साइंस यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉ. आरएस शर्मा का कहना है कि करीब 105 डेसिबल या उससे अधिक की तेज आवाज में लंबे समय तक रहने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। तेज ध्वनि का असर कान के नर्वस सिस्टम पर पड़ता है। लंबे समय तक तेज ध्वनि के संपर्क में रहने से स्थायी बहरापन भी आ सकता है। तेज आवाज के कारण कानों में घंटी या सीटी बजने जैसी समस्या टिनिटस हो सकती है। कान में दर्द की शिकायत भी हो सकती है।

बढ़ता है स्ट्रेस हार्मोन स्राव

डॉ. आरएस शर्मा के अनुसार तेज ध्वनि से स्ट्रेस हार्मोन स्राव (कॉर्टिसोल, एड्रिनलीन) बढ़ता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और हार्ट की गति बढ़ जाती है। यह स्थिति जब अधिक समय तक रहती है तो हार्ट अटैक व लकवा होने की शिकायत हो सकती है। डॉ. शर्मा के अनुसार डीजे और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम से सतर्क रहने की आवश्यकता है। डीजे तथा सायरन जैसी ध्वनियां करीब 110 से 120 डेसिबल तक पहुंच सकती हैं, इसलिए इनके अत्यधिक संपर्क से बचना जरूरी है।

बच्चों और बुजुर्गों को रखें दूर

छोटे बच्चों को तेज आवाज वाले स्पीकर के बिल्कुल पास खड़ा करने से बचना चाहिए। बुजुर्गों और ऐसे लोगों के लिए भी सावधानी जरूरी है, जिन्हें पहले से सुनने, नींद या हृदय संबंधी परेशानी है। कार्यक्रमों में स्पीकर की आवाज नियंत्रित रखने और लोगों से उचित दूरी बनाए रखने से शोर का जोखिम कम किया जा सकता है।

आवाज कम रखना सबसे आसान उपाय

ध्वनि के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए ‘60/60 नियम’ अपनाने की सलाह दी गई है। इसके तहत आवाज को अधिकतम स्तर के लगभग 60 प्रतिशत तक सीमित रखने और लगातार लंबे समय तक तेज आवाज सुनने से बचने की बात कही गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार तेज आवाज से बचाव का सबसे व्यावहारिक तरीका शोर की तीव्रता और उसके संपर्क की अवधि कम करना है। यदि तेज आवाज के बाद लगातार कानों में घंटी या सीटी बजती रहे, सुनाई देने में कमी महसूस हो या कान में दर्द हो तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।