
जबलपुर। पितृ पक्ष की शुरुआत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से होती है। तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि। पितृ पक्ष के 15-16 दिनों के बाद पितरों के सम्मान में तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान पितर पृथ्वी पर आते हैं। तर्पण, श्राद्ध आदि सभी प्रसन्न या असंतुष्ट पितरों के लिए किया जाता है। पितृ दोष से पीड़ित लोग पितृ पक्ष के दौरान इससे छुटकारा पाने के उपाय भी कर सकते हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे के अनुसार पितृ पक्ष में तर्पण, श्राद्ध आदि की 16 तिथियां होती हैं। प्रत्येक पूर्वज की अपनी-अपनी निश्चित तिथि होती है, जिस दिन उनके लिए तर्पण, श्राद्ध आदि किया जाएगा। जिनकी मृत्यु की तारीख अज्ञात होती है, उनके लिए भी अमावस्या की तिथि तर्पण के लिए शुभ मानी जाती है।
।। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ।।
अर्थात : स्वयं के धर्म में निधन होना कल्याण कारण है, जबकि दूसरे के धर्म में मरना भय को देने वाला है।
26 सितंबर से शुरू होगा पितृ पक्ष
ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे के अनुसार शनिवार, 26 सितंबर को भादौ मास की पूर्णिमा है। इस तिथि पर भाद्रपद मास खत्म हो जाएगा। श्राद्ध पूर्णिमा 26 सितंबर को रहेगा और इसी दिन से पितृ पक्ष मास शुरू होगा। इस मास के कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष मनाया जाता है। इन दिनों में पितरों के लिए शुभ काम किए जाते हैं।
पितृ पक्ष में सभी तिथियों का अलग-अलग महत्व है। आमतौर पर किसी व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि पर होती है, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। पितृ पक्ष में किस तिथि पर किसका श्राद्ध होता है, जानिए…
पूर्णिमा — 26 सितंबर
जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा तिथि पर हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन करना चाहिए। इस तिथि से पितृ पक्ष शुरू होता है।
प्रतिपदा — 27 सितंबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी माह के किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर हुई हो। नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो और उसकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।
द्वितीया — 28 सितंबर
द्वितीया तिथि पर मृत लोगों का श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
तृतीया — 29 सितंबर
जिसकी मृत्यु तृतीया तिथि पर हुई हो, उसका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इस बार दो दिन तृतीया तिथि रहेगी।
चतुर्थी — 30 सितंबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि पर हुई हो।
पंचमी — 1 अक्टूबर
पंचमी तिथि पर मृत व्यक्ति का श्राद्ध इस दिन किया जाता है। अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु हो गई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए।
षष्ठी एवं सप्तमी — 2 अक्टूबर
षष्ठी एवं सप्तमी तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु षष्ठी या सप्तमी तिथि पर हुई हो।
अष्टमी — 3 अक्टूबर
जिस व्यक्ति की मृत्यु किसी भी माह और किसी भी पक्ष की अष्टमी पर हुई है, उसका श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है।
नवमी — 4 अक्टूबर
जिन लोगों का देहांत किसी माह की नवमी तिथि पर हुआ है, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
अगर किसी महिला की मृत्यु हो गई है और मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है तो उसका श्राद्ध नवमी तिथि पर किया जाता है। अगर माता की मृत्यु हो गई है तो नवमी तिथि पर उनका श्राद्ध करने की परंपरा है।
दशमी — 5 अक्टूबर
दशमी तिथि पर मृत लोगों का श्राद्ध दशमी तिथि पर किया जाता है।
एकादशी — 6 अक्टूबर
इस तिथि पर मृत लोगों का और मृत संन्यासियों का श्राद्ध एकादशी पर किया जाता है।
द्वादशी — 7 अक्टूबर
इस तिथि पर मृत लोगों का श्राद्ध द्वादशी तिथि पर किया जाता है।
त्रयोदशी — 8 अक्टूबर
अगर किसी बच्चे की मृत्यु हो गई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करने की परंपरा है।
चतुर्दशी — 9 अक्टूबर
जिन लोगों की मृत्यु किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।
अमावस्या — 10 अक्टूबर
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पर ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए।
श्राद्ध और तर्पण से पितरों की तृप्ति
ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म अर्थात तर्पण, पिंडदान, पंचबलि कर्म, ब्राह्मण भोज, घी मिली हुई खीर का दान, वस्त्र आदि दान कर्म करने से पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। उनकी मुक्ति और तृप्ति के लिए यह उत्तम माना गया है।
गजछाया योग में श्राद्ध का महत्व
कहते हैं कि गजछाया योग में किए गए श्राद्ध और दान से पितरों की अगले 12 सालों के लिए क्षुधा शांत हो जाती है। यह श्राद्ध कर्म के लिए अत्यन्त शुभ योग है। इसमें किए गए श्राद्ध का अक्षय फल होता है।
श्राद्ध कर्म और पितृ पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। पितृ पक्ष में गजछाया योग होने पर तर्पण और श्राद्ध करने से वंश वृद्धि, धन-संपत्ति और पितरों से मिलने वाले आशीर्वाद प्राप्त होता है।