
राकेश कुमार शर्मा
पन्ना। दक्षिण पन्ना वनमंडल के छह मैदानी वनकर्मियों द्वारा किए गए अध्ययन में सर्पदंश से जुड़ी गंभीर परिस्थितियों का खुलासा हुआ है। वनमंडल के छह परिक्षेत्रों के करीब 280 गांवों में 5 साल में हुई सर्पदंश की 1261 घटनाओं का विश्लेषण किया गया। इनमें 1065 लोग स्वस्थ हुए, 34 को स्थायी शारीरिक समस्याएं हुईं, जबकि 162 लोगों की मौत दर्ज की गई।
अध्ययन के अनुसार, मृतकों में 84 लोगों की मौत सोते समय सर्पदंश से हुई। वहीं, 14 वर्ष तक के 73 बच्चों में से 32 की जान नहीं बचाई जा सकी। नींद के दौरान सर्पदंश के शिकार हुए 25 बच्चों में से 20 की मौत हुई। करैत जैसे विषैले सांपों के मामले में कई बार दंश का पता देर से चलना भी गंभीर खतरा बनता है।
झाड़-फूंक में देरी, बढ़ा जान का जोखिम
अध्ययन में सामने आया कि करीब 67 प्रतिशत पीड़ित उपचार के लिए सबसे पहले झाड़-फूंक या वैद्य के पास पहुंचे। ऐसे मामलों में अस्पताल पहुंचने का मध्यक समय तीन घंटे रहा, जबकि सीधे अस्पताल जाने वालों में यह एक घंटा था। गंभीर विषैले सर्पदंश के मामलों में एक घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचने वालों की मृत्यु का अनुपात 12.9 प्रतिशत, जबकि चार घंटे से अधिक देरी से पहुंचने वालों में 46.2 प्रतिशत रहा।
सर्वेक्षण में 72.5 प्रतिशत घटनाएं वर्षा ऋतु में हुईं। रात में आवागमन के दौरान सर्पदंश के शिकार 311 लोगों में से केवल 65 के पास टॉर्च थी।
सुरक्षित नींद और समय पर उपचार पर जोर
अध्ययन में मच्छरदानी और ऊंचे बिस्तरों का उपयोग, टॉर्च व बंद जूते पहनने, घरों के आसपास सफाई रखने तथा सर्पदंश होने पर तत्काल अस्पताल पहुंचने की सलाह दी गई है। साथ ही, ग्रामीणों को जागरूक करने और पारंपरिक उपचारकर्ताओं को मरीजों को तुरंत अस्पताल भेजने के लिए प्रेरित करने पर जोर दिया गया है।
ग्रीन इंडिया मिशन के तहत वनमंडल की शोध पहल ‘अरण्य अन्वेषण’ के अंतर्गत किए गए इस अध्ययन में वीरेंद्र पटेल, रंजना नागर, उदयभान सिंह, सचेंद्र मोहन, महेंद्र अग्रहरि और राजू अहिरवार ने योगदान दिया। वन विभाग द्वारा सर्पदंश जागरूकता के लिए ‘सांप-सीढ़ी’ शैक्षणिक खेल और 54 कार्डों वाले ‘सर्पलोक’ जैसे नवाचार भी किए जा रहे हैं।