
उत्तरकाशी। प्रकृति के बीच जब कांक्रीट की दीवारें बन जाती हैं तो प्रकृति कुपित होती है। उसके मार्ग में रुकावट डालने की कोशिश जब भी की गई, प्रकृति ने उस कोशिश को अपने सैलाब से ढहा दिया। प्रकृति बादलों के नीचे किसी तरह का कृत्रिम ढांचा नहीं चाहती। वह उसे पीड़ा देता है।
वह तो अपने रास्ते बरसों से चलती आ रही, लेकिन उसके रास्ते में शासन-प्रशासन ने कंक्रीट की दीवारें, पहाड़ों को तोड़कर सड़कें बना दीं। जिसका नतीजा इस तरह भयावह रूप से सामने आ रहा है। आज स्थिति यह है कि धराली जैसी सुंदर स्थान पर रेस्क्यू टीम को मलबे के नीचे लोगों की धड़कनों को सुनने की कोशिश करनी पड़ रही है, जिससे कि उन्हें बचाया जा सके।

मंगल को हुआ अमंगल
उत्तराखंड के धराली में मंगलवार को अमंगल हुआ। मंगलवार को धराली में बादल फटने से जलप्रलय आ गया। तबाही का ऐसा मंजर आया कि जिसने उसका वीडियो देखा उसकी रूह कांप गई। धराली में खीरगंगा नदी के साथ आए सैलाब ने तबाही मचा दी। मलबे में दबने से चार लोगों की मौत हो गई।
घटना में 100 से अधिक लोग लापता हैं। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के अलावा सेना, आईटीबीपी और पुलिस के जवानों ने बचाव अभियान तुरंत शुरू कर दिया, जिसमें करीब 130 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया। सैलाब में लोगों के घर, दुकानें, होम स्टे ध्वस्त हो गए।
प्रकृति की चेतावनी
यह प्रकृति की चेतावनी है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हिमालय के क्षेत्र में बसे इलाके को छेड़ना ही नहीं चाहिए। वहां विकास के नाम पर यदि पहाड़ों को काटा गया तो इस तरह की आपदा आने की संभावना रहती है। अखबारों में छपी रिपोर्ट के आधार पर यह बताया गया है कि भूगर्भ वैज्ञानिकों ने धराली गांव को कहीं और बसाने की सलाह राज्य सरकार को दी थी। इसके बाद भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।
उत्तराखंड में पूर्व की घटनाएं
उत्तराखंड में 1952 में पहली घटना हुई, जिसमें सतपुली कस्बा तबाह गया। 1954 में रुद्रप्रयाग के डडुवा गांव में भूस्खलन हुआ। 2013 में केदारनाथ में बादल फटने से हजारों लोगों की मौत हुई थी।