
जबलपुर। मन से विचारे हुए कार्य को वाणी से नहीं कहना चाहिए। मन्त्र के समान मन से विचारे को गुप्त बनाकर रक्षा करनी चाहिए, और फिर क्रियात्मक रूप से कर देना चाहिए। श्रीमद् भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पंचम दिवस जगदगुरु डॉ. स्वामी नरसिंहदेवाचार्य जी महाराज ने कहा परमात्मा अजन्मा है उसका जन्म नहीं होता पर भक्तों के लिए वह जन्म भी धारण करता है। आनन्दित करते हैं- “निशीथे तम उद्भूते जायमाने जनार्दने”।

जनार्दन के रूप में भगवान का दिव्य प्राकट्य
भगवान जनार्दन के रूप में प्रगट हुए, जनार्दन अर्थात जो जन-जन का परम कल्याण करने वाला है। भगवान चतुर्भुज रूप में महाराज वसुदेव जी को दर्शन दिये, पर जब वसुदेव व देवकी दोनों ने भगवान की स्तुति करते हैं उस समय भगवान “बभूव प्राकृतः शिशुः” प्राकृत शिशु बन गये। मथुरा से ब्रज में भगवान पधारे और पूरे ब्रज में जन्मोत्सव ऐसे मनाया गया जैसे घर-घर में लाला का जन्म हुआ हो।
पूतना मोक्ष और कंस के दैत्यों का अंत
जब श्रीकृष्ण छै दिवस के हो गये छठी उत्सव के समय अविधा पूतना अपने स्तनों में हलाहल विष भरकर मारने को आई किन्तु उसे भी भगवान ने माता की गति प्रदान किया। परम उदार अविनाशी भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के द्वारा भेजे गये मायावी दैत्यों का तो अन्त करते हैं तथा ब्रह्मा, इन्द्रादिक देवताओं के अहंकार का मन मर्दन करते हैं।
ग्वाल-बाल लीलाएँ और असुर-विनाश
भगवान अपने ग्वाल सखाओं के साथ वत्स चारण, फिर गो-चारण करते हुए असुरों का उद्धार करते हुए वृन्दावन के पावन पुलिन को दिव्यता प्रदान किया।
व्यासपीठ पूजन एवं उपस्थित श्रद्धालु
व्यास पीठ का पूजन हेमलता उमेश तिवारी, राजेश नीलम तिवारी, दीपक तिवारी, वासुदेव तिवारी, महेश तिवारी, रितेश मिश्रा, दीक्षा, साक्षी ने किया।
इस अवसर पर सतेन्द्र ज्योतिषी, रामफल शास्त्री उपस्थिति रहे।