जंक फूड से सेहत को खतरा, आर्थिक सर्वेक्षण और हार्वर्ड शोध ने जताई चिंता

नई दिल्ली। जंक फूड सेहत पर जंग लगा रहा है। भारत में फास्ट फूड और जंक फूड का बढ़ता चलन अब केवल खान-पान की आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। युवाओं समेत यह उन सभी पर लागू होता है जो इसका लगातार सेवन कर रहे हैं। भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक अध्ययनों में यह स्पष्ट किया गया है कि अत्यधिक प्रोसेस्ड, फास्ट और जंक फूड का नियमित सेवन मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बड़ा कारण बन रहा है।

आर्थिक सर्वेक्षण में क्या कहा गया

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और जंक फूड का उपभोग तेजी से बढ़ा है। रिपोर्ट बताती है कि देश में हर साल करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का प्रोसेस्ड और जंक फूड खपत हो रहा है। पिछले दो दशकों में इसकी बिक्री में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

रिपोर्ट में यह देखा गया है कि वर्ष 2005 से वर्ष 2019 के अंतराल में हुए दो सर्वेक्षणों में पुरुष और महिला में मोटापा करीब ढाई गुना बढ़ा मिला। चिंता जनक बात यह है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मोटापा 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया।

सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि इसी अवधि में मोटापे की दर लगभग दोगुनी हो चुकी है, जो आगे चलकर गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे डायबिटीज़, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप को बढ़ावा दे रही है। इसी वजह से आर्थिक सर्वेक्षण में जंक और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर हेल्थ टैक्स जैसे कदमों पर विचार करने की सलाह दी गई है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोध के निष्कर्ष

हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुड़े अध्ययनों में पाया गया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन सीधे तौर पर खराब स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा हुआ है।

शोध के अनुसार जंक फूड में अत्यधिक चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा होती है, जिससे वजन तेजी से बढ़ता है। नियमित रूप से फास्ट फूड खाने वालों में हृदय रोग, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा अधिक पाया गया। टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम भी ऐसे लोगों में कहीं ज्यादा देखा गया, जो प्रोसेस्ड भोजन पर निर्भर रहते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा असर

केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी जंक फूड का गंभीर प्रभाव सामने आया है। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि फास्ट फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड आहार लेने वाले लोगों में डिप्रेशन, चिंता और मूड डिसऑर्डर की संभावना बढ़ जाती है।

कुछ शोधों में यह भी पाया गया कि अधिक वसा और चीनी युक्त भोजन दिमाग की कार्यक्षमता और याददाश्त पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

बच्चों और युवाओं पर बढ़ता खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों और युवाओं में जंक फूड की बढ़ती आदत सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। कम उम्र में ऐसी आदतें भविष्य में मोटापा, कमजोर इम्युनिटी और लाइफस्टाइल डिजीज़ का कारण बन सकती हैं।

इसके अलावा, पोषण की कमी के कारण किशोरों में एनीमिया और कमजोरी जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

विशेषज्ञों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि फास्ट और जंक फूड का सेवन सीमित किया जाना चाहिए। ताजे फल, सब्जियां, दालें और घर का बना भोजन प्राथमिकता में होना चाहिए। बच्चों और किशोरों में स्वस्थ खान-पान की आदतें बचपन से ही विकसित करना जरूरी है।

आर्थिक सर्वेक्षण और हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के शोध यह साफ संकेत देते हैं कि जंक और फास्ट फूड केवल स्वाद का विषय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन चुके हैं। यदि समय रहते खान-पान की आदतों में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में देश को स्वास्थ्य पर भारी आर्थिक और सामाजिक बोझ उठाना पड़ सकता है।

Back to top button