
जबलपुर। अपने पूर्वजों, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करने की क्रिया का नाम ही “श्राद्ध” है। हमारे पूर्वज अपने माता-पिता, अपने बड़ों अथवा पारिवारिक जनों में इतनी श्रद्धा रखते थे कि उनके निधन के बाद भी उनकी स्मृति और सम्मान में यथायोग्य दान-पुण्य, सत्कर्म किया करते थे। अपने पितरों के प्रति यही श्रद्धांजलि कालांतर में “श्राद्ध” कर्म के रूप में मनाई जाने लगी।

जीवित माता-पिता के प्रति श्रद्धा भी जरूरी
वर्तमान परिस्थितियों में इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हमारी श्रद्धा मृत माता-पिता में तो होनी ही चाहिए, लेकिन उससे महत्वपूर्ण यह है कि जीवित माता-पिता में भी हमारी श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा वही फलदायी होती है, जो जीवित मां-बाप के प्रति हो, अन्यथा उनके मरने के बाद किया जाने वाला श्राद्ध एक आत्मप्रवंचना से ज्यादा कुछ नहीं होगा।
माता-पिता की सेवा और सम्मान का दिया संदेश
जो जीवित मां-बाप के प्रति श्रद्धा रखता है, वही मृत मां-बाप के प्रति “श्राद्ध” कर्म करने का सच्चा अधिकारी भी बन जाता है। श्राद्ध के इन दिवसों में हम अपने पूर्वजों का तो स्मरण करें ही, साथ ही आजीवन अपने घर में माता-पिता व बड़ों की श्रद्धापूर्वक सेवा और सम्मान भी अवश्य करें। उक्त उद्गार भागवताचार्य स्वामी श्रीअशोकानंद जी महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह के प्रथम दिवस व्यास पीठ से कहे।
26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक भागवत कथा
भक्ति धाम गौरीघाट में पितृपक्ष के अवसर पर नर्मदा मैया के तट पर परम पूज्य भागवताचार्य स्वामी श्रीअशोकानंद जी महाराज के श्रीमुख से 26 सितंबर से 2 अक्टूबर तक दोपहर 4 बजे से श्रीमद् भागवत महापुराण का व्यास पीठ से श्रवण कराया जाएगा।
श्रद्धालुओं से उपस्थिति का आग्रह
भागवत सेवा समिति के गोपाल, पप्पू, विजय, उमेश पारवानी, वेदान्त शर्मा, करिश्मा शर्मा, जया लालवानी, हितिशा शर्मा, विनू माखीजा, ममता कुकरेजा, घनश्याम निरंकारी, दिलीप तलरेजा, नरेंद्र, पुष्पराज पंडित, लालू महाराज, अभिषेक और रामजी पुजारी ने श्रद्धालु भक्तों से उपस्थिति का आग्रह किया है।