
कौशल में नहीं, सम्मान और अधिकार में गिरावट
आज के इंजीनियर प्रतिभा, तकनीकी दक्षता या समर्पण में किसी से कम नहीं हैं। जो चीज कमजोर हुई है, वह है संस्थागत सम्मान। लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, रेलवे या राज्य विद्युत उपक्रमों में कार्यरत इंजीनियरों की तकनीकी सिफारिशों को अक्सर ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा खारिज, विलंबित या कमजोर कर दिया जाता है, जिनके पास संबंधित विषय का तकनीकी प्रशिक्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता।
जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे मजबूत इंजीनियरिंग संस्कृति वाले देशों की तुलना करें, तो वहां तकनीकी योग्यता अक्सर बुनियादी ढांचा मंत्रालयों में नेतृत्व तक पहुंचने का महत्वपूर्ण मार्ग होती है। भारत में, इसके विपरीत, पुलों के डिजाइन या विद्युत प्रणालियों में दशकों का अनुभव रखने वाले इंजीनियर को भी कई बार सामान्य तकनीकी स्वीकृतियों के लिए ऐसे प्रशासनिक अधिकारी की मंजूरी लेनी पड़ती है, जिसके पास संबंधित विषय का तकनीकी अनुभव नहीं होता।
इंजीनियरिंग सेवाएं बनाम प्रशासनिक सेवाएं: एक असमान स्थिति
यह प्रशासनिक सेवाओं की भूमिका को कम करने का आह्वान नहीं है। शासन, समन्वय और नीतियों के क्रियान्वयन में आईएएस तथा अन्य प्रशासनिक सेवाओं का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन एक संरचनात्मक असंतुलन पर विचार करना आवश्यक है:
- निर्णय लेने का अधिकार: सिंचाई परियोजनाओं, विद्युत परियोजनाओं, राजमार्गों और शहरी नियोजन जैसे प्रमुख बुनियादी ढांचा संबंधी निर्णयों पर अंतिम स्वीकृति अक्सर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा दी जाती है, जबकि उनका तकनीकी परीक्षण और डिजाइन करने वाले इंजीनियर सलाहकार की भूमिका तक सीमित रह जाते हैं।
- पदोन्नति की सीमा: अनेक राज्य संवर्गों में इंजीनियरों की पदोन्नति का स्तर उन ऊंचाइयों तक नहीं पहुंचता, जहां प्रशासनिक अधिकारी पहुंच सकते हैं, जबकि संबंधित विभाग मूलतः इंजीनियरिंग-आधारित होते हैं।
- सार्वजनिक पहचान: जिला कलेक्टर को अधिकार और प्रशासन का प्रतीक माना जाता है। इसके विपरीत, मुख्य अभियंता, जिन पर पुलों, बांधों और भवनों की सुरक्षा जैसी महत्वपूर्ण तकनीकी जिम्मेदारियां होती हैं, अक्सर समान सार्वजनिक पहचान नहीं रखते।
- अधिकार के बिना जवाबदेही: जब कोई संरचना विफल होती है, तो जांच का पहला सामना अक्सर इंजीनियर को करना पड़ता है। जबकि बजट, समय-सीमा या सामग्री की स्वीकृति पर अंतिम निर्णय कई बार इंजीनियर के हाथ में नहीं होता।
जिम्मेदारी और अधिकार के बीच यही असंतुलन सार्वजनिक सेवा में इंजीनियरिंग के घटते प्रतिष्ठित स्थान का एक प्रमुख कारण है, जबकि निजी क्षेत्र और वैश्विक स्तर पर इंजीनियरों के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं।
राष्ट्र निर्माण के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है
सड़कें, विद्युत परियोजनाएं, जल प्रणालियां, दूरसंचार, रेलवे और अब डिजिटल बुनियादी ढांचा—किसी भी राष्ट्र की भौतिक और तकनीकी रीढ़ इंजीनियरिंग से निर्मित होती है, केवल प्रशासन से नहीं। किसी देश की विकास दर का सीधा संबंध उसके बुनियादी ढांचे के निर्माण की गुणवत्ता और गति से होता है।
जब तकनीकी निर्णयों को गैर-तकनीकी स्वीकृति प्रक्रियाओं के नीचे दबा दिया जाता है, तो परियोजनाएं धीमी होती हैं, लागत बढ़ती है और गुणवत्ता प्रभावित होती है। भारत के इतिहास में बुनियादी ढांचे की बड़ी देरी या लागत वृद्धि के पीछे कहीं न कहीं तकनीकी निर्णयों के प्रक्रियात्मक अथवा प्रशासनिक बाधाओं के अधीन हो जाने की कहानी मिलती है।
यदि भारत को स्मार्ट सिटी, नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण, हाई-स्पीड रेल और सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे लक्ष्यों को पूरा करना है, तो ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें इंजीनियरिंग विशेषज्ञता को उसके अनुरूप अधिकार मिले, न कि केवल सलाह देने तक सीमित रखा जाए।
एक समर्पित इंजीनियरिंग आयोग की आवश्यकता
डॉक्टरों के लिए मेडिकल काउंसिल (अब राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग), चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के लिए आईसीएआई और वकीलों के लिए बार काउंसिल जैसी संस्थाएं हैं। इंजीनियर, जो देश के सबसे बड़े तकनीकी कार्यबलों में से एक हैं, उनके लिए ऐसा कोई एक सशक्त, स्वायत्त और प्रभावी राष्ट्रीय निकाय नहीं है, जो:
- सरकारी सेवा में इंजीनियरों के पेशेवर मानकों और कैरियर प्रगति की रक्षा एवं निर्धारण कर सके।
- मनमाने प्रशासनिक हस्तक्षेप का सामना कर रहे इंजीनियरों के लिए शिकायत एवं सलाह का मंच बन सके।
- इंजीनियरिंग-प्रधान विभागों में तकनीकी और प्रशासनिक संवर्गों के बीच वेतनमान, पदोन्नति तथा निर्णय लेने के अधिकार में समानता की सिफारिश कर सके।
- बुनियादी ढांचा नीति पर सरकार को सीधे सलाह दे सके।
- वैश्विक मानकों के अनुरूप इंजीनियरिंग प्रथाओं का प्रमाणीकरण और निरंतर उन्नयन कर सके।
एक वैधानिक राष्ट्रीय इंजीनियर्स आयोग, जिसमें लोक निर्माण, रेलवे, विद्युत, दूरसंचार और अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग सेवाओं का प्रतिनिधित्व हो, इंजीनियरों की उस संस्थागत आवाज का कार्य कर सकता है, जिसका आज अभाव है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक सेवाओं का स्थान लेना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे और जनसुरक्षा से जुड़े तकनीकी निर्णयों में तकनीकी जिम्मेदारी के अनुरूप तकनीकी अधिकार भी हो।
सिर्फ उत्सव नहीं, आत्ममंथन का अवसर
इंजीनियर्स डे केवल सम्मान समारोहों और तकनीकी प्रदर्शनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह नीति-निर्माताओं के लिए एक कठिन प्रश्न पूछने का अवसर होना चाहिए: क्या हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जिसमें देश के इंजीनियर अपना सर्वश्रेष्ठ कार्य कर सकें, या हम अनजाने में कुशल तकनीकी पेशेवरों की एक पूरी पीढ़ी को दूसरों द्वारा लिए गए निर्णयों का केवल क्रियान्वयनकर्ता बना रहे हैं?
सर एम. विश्वेश्वरैया केवल किसी दूसरे की परिकल्पना को लागू करने वाले तकनीशियन नहीं थे। वे निर्णयकर्ता, योजनाकार और अंततः मैसूर राज्य के दीवान (मुख्यमंत्री) बने। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब इंजीनियरों को अधिकार और जिम्मेदारी के साथ काम करने का अवसर दिया जाता है, तो राष्ट्र मजबूत और टिकाऊ बनते हैं।
इंजीनियरों का सम्मान बहाल करना उन पर कोई उपकार नहीं है—यह भारत के अपने विकास की गुणवत्ता और गति में निवेश है।
— शैलेन्द्र दुबे
अध्यक्ष, ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF)