
राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने अपनी पुस्तक “आरोग्यनी चाबी” में कहा है, “हमारे सभी अंगों के नियमपूर्वक काम करने पर ही शरीर का सही संचालन निर्भर है। किसी भी खास अंग के रुकने से गाड़ी अटक जाती है। इनमें भी, आंते यदि अपना काम ठीक नहीं करती तो समूचा शरीर गंदा हो जाता है। इस दृष्टि से कहना चाहिए कि अपच या कब्ज की ओर से लापरवाह रहने वाले शरीर धर्म को नहीं जानते। अनेक रोग इसी में पैदा होते हैं।”
अतः यह समझ में आता है कि अधिकतर लोग स्वयं के शरीर की कार्यविधि और अपनी प्रकृति के बारे में नहीं जानते। उन्हें कोष्ठबद्धता (कब्ज) क्यों है, यह जानने का प्रयास भी नहीं करते। इसकी उपेक्षा करते हैं और नित्य रेचन वाली औषधि लेते हैं।
कोष्ठबद्धता क्या है
साधारणतः कोष्ठबद्धता (कब्ज) एक सामान्य किंतु कष्टदायक रोग है, जिसमें व्यक्ति को नियमित रूप से मलविसर्जन नहीं हो पाता अथवा जब बड़ी आंतों पर मल का कब्जा हो जाता है तो मल अधिक कठोर हो जाता है और दो-तीन दिन तक शौच नहीं होती। मल की गांठे बन जाती हैं और मल विसर्जन में अधिक समय लगता है। आयुर्वेद शास्त्र में इसे “मलावरोध” कहा गया है, जो मुख्यतः वात दोष के कुपित होने से होता है। इसे मलबंध, विबंध, विष्टब्धता, आनाह आदि भी कहते हैं।
लक्षण और दुष्प्रभाव
इस समस्या में कोष्ठ पूर्ण रूप से स्वच्छ नहीं हो पाता। मन में ग्लानि, आलस्य भाव, ज्वर भाव, अरुचि, शिरशूल, मुख से दुर्गंध का आना आदि लक्षण दिखाई पड़ते हैं। यदि कोष्ठबद्धता लंबी अवधि तक बनी रहती है तो भविष्य में मस्से, मूलव्याधि, अर्श, गृध्रसी, फोड़े-फुन्सी, संग्रहणी, अजीर्ण, रक्तचाप, धातुदौर्बल्य, स्वप्नदोष, स्त्रियों को प्रदर, मासिक की अनियमितता, मुहांसे, केश झड़ना, केशों का सफेद होना आदि होने की संभावना होती है। इसलिए इसे “रोगों की नानी” भी कहते हैं।
कोष्ठबद्धता के मुख्य कारण
शौच को रोकना, वेगों को रोकना, शौच में जल्दबाजी, असमय और अनियमित आहार, अहितकर आहार, आवश्यकता से अधिक या कम अंतराल में भोजन, कम पानी पीना, मानसिक चिंता, नशा, बिना भूख के खाना, जल्दी-जल्दी बिना चबाए खाना, प्रथम आहार पचने के पूर्व पुनः आहार ग्रहण करना आदि इसके प्रमुख कारण हैं।
पाचन तंत्र की कार्यविधि
जब हम ठोस आहार ग्रहण करते हैं तो दांतों से चबाकर वह लार के साथ आमाशय में जाता है, जहां पाचन प्रक्रिया प्रारंभ होती है। भोजन छोटी आंतों में जाकर सूक्ष्म खंडों में विभाजित होता है और लगभग साढ़े चार घंटे बाद बड़ी आंत में प्रवेश करता है। मल को आड़ी आंतों तक पहुंचने में लगभग नौ घंटे लगते हैं तथा बीसवें घंटे में मलद्वार से बाहर निकलता है। यदि मल समय पर बाहर नहीं निकलता तो वह अंदर सड़कर विषाक्त गैस बनाता है, जो संपूर्ण शरीर के कार्यों में बाधा उत्पन्न करती है।
गलत आदतें और भ्रम
अधिकतर लोगों को मल विसर्जन के लिए चाय, गरम पानी, बीड़ी, सिगरेट, गुटका या तंबाखू का सहारा लेना पड़ता है। कुछ लोग शौचालय में समाचार पत्र पढ़ते हैं। बार-बार औषधि के सेवन से आंतें स्वाभाविक कार्य करना छोड़ देती हैं और भोजन को पूर्ण पाचन से पूर्व ही बाहर कर देती हैं।
आहार एवं जीवनशैली समाधान
मैदे की जगह चोकर सहित मोटा आटा, कनकी युक्त चावल, हरी शाक-भाजी, अन्न से दुगुनी मात्रा में तरकारी, लौकी, परवल, तुरई, गाजर, सलाद में नींबू रस व अल्प नमक, पपीता, अमरूद, अंजीर, किशमिश आदि ग्रहण करें। शास्त्रानुसार दिन में तीन बार भोजन करें, दो बार भोजन और भी उत्तम है, किंतु प्रथम भोजन का पूर्ण पाचन आवश्यक है।
निष्कर्ष
कोष्ठबद्धता एक गंभीर समस्या है, जिसकी उपेक्षा अनेक रोगों को जन्म देती है। संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या और सक्रिय जीवनशैली ही इसका एकमात्र उपाय है। कोष्ठबद्धता से मुक्ति का विचार शौचालय में नहीं, अपितु अपने घर के भोजनालय में किया जाना चाहिए।
सार्वजनिक हित में जनजागृति एवं स्वास्थ्य रक्षण हेतु।
ऊं श्री धन्वंतरेणमः 🙏
लेखक: नितिन देसाई
आयुर्वेद शास्त्र चिंतक, विचारक