VIDEO: ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिताः’ के संकल्प के साथ जल साधना सम्पन्न

जबलपुर। माँ नर्मदा के पावन तट जिलहरी घाट पर अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा विगत पाँच वर्षों से निरंतर संचालित की जा रही विशेष “जल साधना” का समापन अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच संपन्न हुआ। समापन अवसर पर पंचकुंडीय गायत्री महायज्ञ आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में साधकों, परिजनों और श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर राष्ट्र जागरण, आत्मशुद्धि और सामाजिक चेतना का संकल्प लिया। कार्यक्रम का मूल भाव था — “वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिताः”, अर्थात हम राष्ट्र में जागृति उत्पन्न करने वाले बनें।

नर्मदा तट पर साधकों ने किया सामूहिक जप और ध्यान

प्रातःकालीन बेला में माँ नर्मदा के शांत, निर्मल और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत वातावरण में साधकों ने सामूहिक रूप से गायत्री महामंत्र का जप, ध्यान एवं साधना की। नाभि चक्र तक जल में खड़े होकर की जाने वाली यह साधना अपने आप में अत्यंत कठिन तप मानी जाती है। साधकों का मानना है कि जल केवल शरीर की शुद्धि का माध्यम नहीं, बल्कि चेतना को निर्मल करने वाला दिव्य तत्व भी है।

साधना, उपासना और आराधना के महत्व पर प्रकाश

कार्यक्रम में आचार्य की आसंदी से संबोधित करते हुए श्रीमती कविता तिवारी ने साधना, उपासना और आराधना के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में जल को जीवन, ऊर्जा और चेतना का आधार माना गया है। यह सम्पूर्ण सृष्टि पंचतत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से निर्मित है और मानव शरीर भी इन्हीं तत्वों का समन्वय है। जब इन तत्वों का संतुलन बिगड़ता है, तब शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक समस्याएँ जन्म लेती हैं।

उन्होंने आयुर्वेद का उल्लेख करते हुए बताया कि वात, पित्त और कफ का संतुलन ही स्वस्थ जीवन का आधार है। वात अर्थात वायु तत्व, पित्त अर्थात अग्नि या ऊष्मा तत्व तथा कफ अर्थात जल तत्व। वर्तमान समय में मनुष्य का जीवन अत्यधिक तनाव, प्रदूषण, असंयम और कृत्रिमता से प्रभावित हो गया है, जिससे शरीर और मन दोनों असंतुलित हो रहे हैं। ऐसे समय में जल साधना जैसी आध्यात्मिक प्रक्रियाएँ व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने का कार्य करती हैं।

जल साधना को बताया आत्मशोधन का महाअभियान

श्रीमती तिवारी ने कहा कि माँ नर्मदा के पवित्र जल में खड़े होकर गायत्री साधना करना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशोधन और चेतना जागरण का महाअभियान है। नाभि चक्र को अन्नमय कोष का प्रवेश द्वार माना गया है और जल तत्व के माध्यम से इस चक्र की शुद्धि व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

पर्यावरण संरक्षण और नशामुक्ति का लिया संकल्प

वक्ताओं ने कहा कि नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवनरेखा हैं। माँ नर्मदा के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि उनके संरक्षण और स्वच्छता का संकल्प लेना भी है। साधकों ने जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और नशामुक्त समाज निर्माण का संकल्प भी लिया। कार्यक्रम में युवाओं की सक्रिय भागीदारी विशेष आकर्षण का केंद्र रही।

आयोजकों ने जताया आभार

मुख्य ट्रस्टी बी. बी. शर्मा ने अपने उद्बोधन में सभी साधकों, व्यवस्थापकों और परिजनों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पाँच वर्षों से निरंतर चल रही यह जल साधना अब केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। उन्होंने अधिक से अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि जब व्यक्ति स्वयं बदलता है तभी समाज और राष्ट्र में परिवर्तन आता है।

उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि विचार क्रांति, नैतिक जागरण और संस्कार निर्माण के माध्यम से एक सशक्त समाज का निर्माण करना है। जल साधना उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो व्यक्ति के भीतर आत्मबल, संयम और सकारात्मक चिंतन का विकास करती है।

महायज्ञ में दी गईं आहुतियां, गूंजा घाट परिसर

समापन अवसर पर पंचकुंडीय यज्ञ में उपस्थित श्रद्धालुओं ने विश्व शांति, राष्ट्र समृद्धि और मानव कल्याण की कामना के साथ आहुतियाँ अर्पित कीं। पूरा जिलहरी घाट गायत्री मंत्रों, यज्ञीय सुगंध और आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान हो उठा।

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