
बेलबाग क्षेत्र का श्री बुद्ध गौड़ उस्ताद अखाड़ा इसी पारंपरिक तैयारी का एक प्रमुख केंद्र है। करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराने इस अखाड़े में कुश्ती और व्यायाम के साथ शारीरिक करतबों की परंपरा भी कायम है। जन्माष्टमी के नजदीक आते ही यहां गोविंदा दल के अभ्यास का सिलसिला तेज हो जाता है।
हर खिलाड़ी की भूमिका पहले से तय
मानव पिरामिड में सभी खिलाड़ियों का काम एक जैसा नहीं होता। सबसे नीचे ऐसे खिलाड़ियों को रखा जाता है, जिनमें अधिक भार संभालने की क्षमता हो। उनके ऊपर क्रमश: ऐसे युवाओं को जगह दी जाती है, जो संतुलन और फुर्ती में बेहतर हों।
ऊंचाई बढ़ने के साथ पिरामिड का आकार छोटा होता जाता है। अंतिम हिस्से में कम वजन वाले खिलाड़ी पहुंचते हैं। सबसे ऊपर रहने वाला गोविंदा मटकी तक पहुंचकर उसे फोड़ने की जिम्मेदारी निभाता है।
अखाड़े के युवा खलीफा शुभम सिंह चौहान के मुताबिक उनकी टीम करीब 36 फीट तक ऊंचा मानव पिरामिड तैयार करने का अभ्यास करती है। इस संरचना के लिए लगभग 36 से 37 खिलाड़ियों की आवश्यकता पड़ सकती है।
नीचे खड़े खिलाड़ियों पर सबसे ज्यादा दबाव
मटकी फोड़ने वाले खिलाड़ी को भले ही सबसे ज्यादा वाहवाही मिलती हो, लेकिन पिरामिड की असली मजबूती नीचे खड़े खिलाड़ियों से तय होती है। उन्हें ऊपर के खिलाड़ियों का भार संभालने के साथ कुछ समय तक अपने शरीर को स्थिर रखना पड़ता है।
इसी वजह से खिलाड़ियों का चयन उनकी शारीरिक क्षमता के आधार पर किया जाता है। मजबूत युवाओं को निचली परत में, जबकि संतुलन और तेजी से मूवमेंट करने वालों को ऊपर की परतों में रखा जाता है।
गुरु पूर्णिमा के बाद बढ़ जाता है प्रशिक्षण
अखाड़े में सालभर व्यायाम और शारीरिक प्रशिक्षण चलता रहता है, लेकिन मटकी फोड़ प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए गुरु पूर्णिमा के आसपास से विशेष अभ्यास शुरू कर दिया जाता है। इसमें बच्चों से लेकर युवाओं तक की भागीदारी रहती है।
प्रशिक्षण के दौरान खिलाड़ियों की ऊंचाई, वजन, ताकत, फुर्ती और संतुलन को देखा जाता है। लगातार अभ्यास के बाद ही प्रतियोगिता के लिए अंतिम टीम का चयन किया जाता है।
‘गोविंदा’ बनना भी आसान नहीं
पिरामिड के सबसे ऊपरी हिस्से में पहुंचने वाले खिलाड़ी का चयन खास तरीके से किया जाता है। कम वजन के साथ उसमें तेजी और ऊंचाई पर संतुलन बनाए रखने की क्षमता होना जरूरी है।
मटकी तक पहुंचने के बाद उसे फोड़ना ही चुनौती नहीं होती, बल्कि सुरक्षित नीचे उतरना भी उतना ही महत्वपूर्ण रहता है। इसी कारण अभ्यास के दौरान खिलाड़ियों की सुरक्षा और गिरने की स्थिति में चोट से बचाव के उपायों पर भी ध्यान दिया जाता है।
भरोसे पर टिकी रहती है पूरी संरचना
मानव पिरामिड में एक खिलाड़ी की छोटी सी गलती पूरी टीम का संतुलन बिगाड़ सकती है। इसलिए यहां व्यक्तिगत ताकत के बजाय सामूहिक तालमेल को अधिक महत्व दिया जाता है।
ऊपर चढ़ने वाला खिलाड़ी नीचे मौजूद साथियों पर भरोसा करता है और नीचे की टीम उसके हर कदम को स्थिर रखने की कोशिश करती है। यही आपसी विश्वास कुछ सेकंड में कई फीट ऊंचा पिरामिड खड़ा करने में मदद करता है।
जबलपुर से दूसरे शहरों तक पहुंची टीम
जन्माष्टमी के दौरान जबलपुर के अलग-अलग क्षेत्रों में कई दिनों तक मटकी फोड़ प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। पुराने अखाड़ों की टीमों को इन आयोजनों में आमंत्रित किया जाता है।
श्री बुद्ध गौड़ उस्ताद अखाड़े के खिलाड़ी जबलपुर के अलावा भोपाल सहित मध्य प्रदेश के अन्य शहरों में भी प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं। टीम ने विभिन्न आयोजनों में पुरस्कार भी हासिल किए हैं।
बदलते दौर में भी जिंदा है अखाड़े की विरासत
जबलपुर में अखाड़ों की परंपरा का इतिहास काफी पुराना है। पहले अखाड़े युवाओं के लिए कुश्ती, व्यायाम, शारीरिक करतब और पारंपरिक युद्धकौशल सीखने के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। आधुनिक जिम और बदलती जीवनशैली के कारण समय के साथ कई अखाड़े बंद हो गए या उनका स्वरूप बदल गया।
इसके बावजूद कुछ पुराने अखाड़े आज भी पारंपरिक प्रशिक्षण की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बेलबाग का यह अखाड़ा भी उन्हीं केंद्रों में शामिल है, जहां जन्माष्टमी की मटकी फोड़ परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंच रही है।
पुरस्कार राशि से अखाड़े और समाज को सहयोग
प्रतियोगिताओं में मिलने वाली पुरस्कार राशि का उपयोग खिलाड़ियों की जरूरतों और अखाड़े के रखरखाव में किया जाता है। अखाड़े से जुड़े लोगों के अनुसार पुरस्कार की राशि का एक हिस्सा सामाजिक और जनसेवा के कार्यों में भी लगाया जाता है।
जन्माष्टमी के दौरान जब गोविंदाओं की टोली कई फीट ऊंचा मानव पिरामिड बनाती है और मटकी फोड़ती है, तब यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं रह जाती। इसके साथ जबलपुर की पुरानी अखाड़ा संस्कृति, अनुशासन, शारीरिक प्रशिक्षण और सामूहिकता की परंपरा भी सामने आती है।