मोबाइल में खो गईं पारंपरिक कलाएं, अब गली-मोहल्लों में नहीं जुटती पहले जैसी भीड़, देखें वीडियो

रवीन्द्र सुहाने

एक समय था जब गली-मोहल्लों में करतब दिखाने वाले आते थे, तो बच्चों का झुंड अपने आप वहां जुट जाता था। तालियों की गूंज, उत्साह और जिज्ञासा से भरा माहौल पूरे क्षेत्र को जीवंत बना देता था। लेकिन आज मोबाइल के दौर में यह दृश्य धीरे-धीरे गायब होता नजर आ रहा है। अब वही करतब, जो कभी भीड़ खींच लेते थे, लोगों का ध्यान तरसते दिखाई देते हैं।

रस्सी पर चलता संतुलन, जीवित है परंपरा

हाल ही में सामने आई एक तस्वीर में एक नन्ही बच्ची रस्सी पर संतुलन बनाकर चलती नजर आई। रस्सी पर चलना एक ऐसा संतुलन-आधारित खेल है जिसमें कलाकार जमीन से ऊंचाई पर बंधी पतली रस्सी या तार पर चलकर अपने शरीर का संतुलन बनाए रखता है।

कलाकार अक्सर एक लंबी लकड़ी (Balance Pole) हाथ में पकड़ता है, जिससे शरीर का भार दोनों तरफ बराबर रहता है। कई बार सिर पर बर्तन या अन्य वस्तु रखकर भी संतुलन दिखाया जाता है, जैसा इस दृश्य में देखा गया।

मेहनत, संतुलन और एकाग्रता का संगम

यह करतब पूरी तरह संतुलन (Balance) और एकाग्रता (Concentration) पर आधारित होता है। छोटी सी गलती भी गिरने का कारण बन सकती है, इसलिए कलाकार का ध्यान पूरी तरह केंद्रित रहता है। बचपन से लगातार अभ्यास के कारण ये कलाकार बेहद लचीले और संतुलित होते हैं, जो इस कला को और भी खास बनाता है।

कौन करते हैं यह पारंपरिक करतब

भारत में यह कला मुख्य रूप से नट (Nat) समुदाय, बंजारा और कालबेलिया जैसी घुमंतू जातियों द्वारा की जाती है। सड़क किनारे प्रदर्शन करने वाले ये पारंपरिक कलाकार इसे अपनी आजीविका का साधन बनाते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाते हैं।

इतिहास में भी रही खास पहचान

रस्सी पर चलने की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन भारत और चीन में इसका उल्लेख मिलता है। पहले यह राजाओं और मेलों में मनोरंजन का प्रमुख हिस्सा हुआ करता था, जो आज भी गांवों, मेलों और शहरों की सड़कों पर देखने को मिल जाता है।

मोबाइल युग में फीकी पड़ी भीड़

पहले जहां ऐसे करतब देखने के लिए लोग खुद रुक जाते थे, वहीं आज मोबाइल और डिजिटल दुनिया ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। बच्चे भी अब स्क्रीन में ज्यादा व्यस्त रहते हैं, जिससे इस तरह की जीवंत लोक कलाओं के दर्शक कम होते जा रहे हैं।

चुनौतियां और सच्चाई

यह करतब देखने में जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। इसमें गिरने का खतरा हमेशा बना रहता है और सुरक्षा के लिए आमतौर पर कोई जाल (Safety Net) भी नहीं होता। कई बार छोटे बच्चे भी इसमें शामिल होते हैं, जो एक चिंता का विषय है।

सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी यह कला चुनौतियों का सामना कर रही है। कलाकारों को स्थायी आय नहीं मिलती और शिक्षा व सुरक्षा की कमी उनके जीवन को और कठिन बना देती है।

तस्वीर में दिखी परंपरा की झलक

इस दृश्य में एक छोटी बच्ची रस्सी पर चल रही है, हाथ में लंबी लकड़ी से संतुलन बना रही है और सिर पर वस्तु रखकर करतब को और कठिन बना दिया गया है। नीचे परिवार का सदस्य उसकी सुरक्षा और मार्गदर्शन करता नजर आ रहा है। यह दर्शाता है कि यह कला आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जा रही है।

जरूरत है संरक्षण और प्रोत्साहन की

रस्सी पर चलना सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक परंपरागत जीवंत कला है, जिसमें कौशल, साहस और मेहनत का अनोखा मेल होता है। बदलते समय के साथ यह जरूरी है कि इन कलाकारों को सुरक्षा और बेहतर अवसर दिए जाएं, ताकि यह कला भी जीवित रहे और आने वाली पीढ़ियां भी इससे जुड़ी रहें।

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